06 मई।
बरगी बांध की ताजा त्रासदी ने एक बार फिर उस सड़े-गले सिस्टम की पोल खोल दी है, जहां लापरवाही केवल गलती नहीं, बल्कि आदत बन चुकी है। यह कोई साधारण दुर्घटना नहीं थी; यह एक ऐसी आपराधिक लापरवाही का परिणाम है, जिसमें इंसानी जानों को सस्ती वस्तु समझ लिया गया। जिस क्रूज पर लोग सैर के लिए गए थे, उसका बीमा कुछ दिन पहले ही खत्म हो चुका था, और इसके बावजूद संचालन जारी रहा। सवाल सीधा है—क्या यह हादसा था या सुनियोजित जोखिम?
पर्यटन विकास निगम के जिम्मेदार अधिकारी यह कहकर पल्ला झाड़ रहे हैं कि उन्हें बीमा समाप्त होने की “आधिकारिक जानकारी” नहीं थी। यह बयान जितना हास्यास्पद है, उतना ही खतरनाक भी है। यदि किसी अधिकारी को यह तक पता नहीं कि उसकी निगरानी में चल रही सेवा का बीमा वैध है या नहीं, तो फिर उसकी कुर्सी पर बैठने का औचित्य क्या है? यह अज्ञानता नहीं, बल्कि घोर गैर-जिम्मेदारी है, और ऐसी गैर-जिम्मेदारी सीधे-सीधे अपराध की श्रेणी में आती है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि बिना बीमा के आम नागरिकों को जोखिम में डालने की अनुमति किसने दी? क्या यह निर्णय किसी एक अधिकारी की लापरवाही थी या पूरे सिस्टम की मिलीभगत? क्योंकि इतने बड़े संचालन में केवल एक व्यक्ति की गलती से काम नहीं चलता। यह संस्थागत विफलता का उदाहरण है, और जब विफलता संस्थागत हो, तो जवाबदेही भी सामूहिक और कठोर होनी चाहिए।
अब जब लोग अपनी जान गंवा चुके हैं, तो बीमा कंपनी से “बातचीत” की बात की जा रही है। यह न केवल पीड़ित परिवारों के साथ अन्याय है, बल्कि उनकी पीड़ा का मजाक भी है। जब बीमा पॉलिसी ही समाप्त हो चुकी थी, तो किस आधार पर क्लेम मिलेगा? और अगर नहीं मिलेगा, तो क्या सरकार फिर वही पुराना खेल खेलेगी—कुछ लाख रुपये का मुआवजा देकर मामला ठंडे बस्ते में डाल देगी?
यह पहली बार नहीं है जब ऐसी लापरवाही सामने आई हो। इससे पहले भी सरकारी विमान बिना बीमा के उड़ाया गया और दुर्घटनाग्रस्त हुआ, जिसमें करोड़ों रुपये का नुकसान हुआ, लेकिन उस समय भी किसी बड़े अधिकारी की जवाबदेही तय नहीं हुई। यही कारण है कि आज भी वही मानसिकता कायम है—“कुछ नहीं होगा”। जब सजा का डर खत्म हो जाता है, तो लापरवाही व्यवस्था का हिस्सा बन जाती है।
आम जनता आखिर कब तक इस गैर-जिम्मेदार तंत्र की कीमत अपनी जान देकर चुकाती रहेगी? लोग अपने परिवार के साथ कुछ पल सुकून के बिताने जाते हैं और वापस ताबूत में लौटते हैं। यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि नैतिक दिवालियापन है।
सरकार को अब यह समझना होगा कि केवल बयानबाजी और जांच समितियां बनाना काफी नहीं है। इस मामले में तत्काल और कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। जिन अधिकारियों की जिम्मेदारी थी, उन्हें न केवल निलंबित किया जाए, बल्कि यदि दोष सिद्ध हो, तो सेवा से बर्खास्त कर उनके पेंशन और भत्तों से पीड़ित परिवारों को मुआवजा दिया जाए। जब तक व्यक्तिगत नुकसान नहीं होगा, तब तक सिस्टम नहीं सुधरेगा।
इसके साथ ही सभी सरकारी सेवाओं के लिए अनिवार्य सुरक्षा ऑडिट लागू किया जाना चाहिए। बीमा, तकनीकी फिटनेस और सुरक्षा मानकों की नियमित जांच हो और उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए। पारदर्शिता और जवाबदेही ही इस सड़ते सिस्टम का इलाज है।
यह समय है जब सरकार को यह साबित करना होगा कि वह जनता की सुरक्षा को प्राथमिकता देती है। वरना हर अगली दुर्घटना के बाद यही सवाल गूंजेगा—क्या हमारी जान की कोई कीमत नहीं? बरगी बांध की यह त्रासदी केवल एक घटना नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। अगर अब भी जिम्मेदारों पर कार्रवाई नहीं हुई, तो यह साफ संकेत होगा कि इस सिस्टम में इंसानी जिंदगी से ज्यादा अहमियत लापरवाही और बचाव की राजनीति को दी जाती है। और तब यह कहना गलत नहीं होगा—यह हादसे नहीं, सरकारी लापरवाही से की गई हत्याएं हैं।