न्यायपालिका
06 May, 2026

7 वर्ष तक की सजा वाले मामलों में कठोर जमानत शर्तें अनिवार्य नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सात वर्ष तक की सजा वाले मामलों में कठोर जमानत शर्तें अनिवार्य नहीं हैं और इन्हें हर मामले में यांत्रिक रूप से लागू नहीं किया जा सकता, बल्कि अदालत का विवेक और परिस्थितियों के आधार पर ही तय किया जाएगा जिससे व्यक्तिगत स्वतंत्रता और न्यायिक संतुलन सुनिश्चित हो सके।

नई दिल्ली, 06 मई।

उच्चतम न्यायालय ने नारायण बनाम मध्य प्रदेश राज्य मामले में जमानत से जुड़े प्रावधानों की महत्वपूर्ण व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 480(3) के अंतर्गत लगाई जाने वाली कठोर शर्तें हर गैर-जमानती प्रकरण में स्वतः लागू नहीं होंगी। न्यायालय ने कहा कि जिन मामलों में अधिकतम सजा सात वर्ष तक निर्धारित है, उनमें कठोर शर्तें अनिवार्य नहीं हैं और यह निर्णय पूरी तरह अदालत के विवेक पर निर्भर करेगा।

इस प्रकरण में एक आरोपी से जुड़ा मामला सामने आया, जिसे अपेक्षाकृत कम गंभीर अपराध में जमानत तो मिल गई थी, लेकिन निचली अदालत ने उस पर कठोर शर्तें लागू कर दी थीं। आरोपी पक्ष ने तर्क दिया कि कम गंभीरता वाले मामलों में इतनी सख्ती अनुचित है और इससे उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता प्रभावित हो रही है। इस पर न्यायालय ने कहा कि कानून को यांत्रिक रूप से लागू नहीं किया जा सकता, क्योंकि प्रत्येक मामले की परिस्थितियां अलग होती हैं और एक समान शर्तें सभी मामलों में लागू करना न्यायसंगत नहीं है।

न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि धारा 480(3) का उद्देश्य केवल गंभीर मामलों में सख्ती सुनिश्चित करना है। इसे प्रत्येक मामले में समान रूप से लागू करना विधायी भावना के विपरीत होगा।

अपने निर्णय में न्यायालय ने निचली अदालतों को यह संदेश दिया कि उन्हें एक समान ढांचे को सभी मामलों पर लागू करने की प्रवृत्ति से बचना चाहिए। अपराध की प्रकृति, आरोपी का आचरण तथा जांच प्रक्रिया पर संभावित प्रभाव को ध्यान में रखकर ही शर्तें तय की जानी चाहिए। अदालत ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सर्वोपरि बताते हुए कहा कि जमानत को दंड के रूप में नहीं देखा जा सकता, बल्कि यह आरोपी का अधिकार है, जब तक दोष सिद्ध न हो जाए।

न्यायालय ने यह भी कहा कि बिना ठोस आधार के कठोर शर्तें लगाना मौलिक अधिकारों के विपरीत है। इस व्याख्या से छोटे और मध्यम स्तर के अपराधों में जमानत प्रक्रिया सरल होने की संभावना है, अनावश्यक हिरासत में कमी आएगी और जेलों में भीड़भाड़ की समस्या को भी कम किया जा सकेगा। साथ ही, ट्रायल अदालतों को अब परिस्थितियों के अनुसार संतुलित और तर्कसंगत शर्तें तय करने की अधिक स्वतंत्रता प्राप्त होगी, जिससे जांच की आवश्यकता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच बेहतर संतुलन स्थापित हो सकेगा।

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