दिल्ली-एनसीआर
25 May, 2026

आदिवासी समाज में धर्मांतरण पर चिंता, घर वापसी की उठी मांग

लाल किले में आयोजित जनजातीय सांस्कृतिक समागम में विभिन्न राज्यों से आए आदिवासी प्रतिनिधियों ने धर्मांतरण, सांस्कृतिक पहचान और जनजातीय अधिकारों को लेकर चिंता जताई।

नई दिल्ली, 25 मई।

आदिवासी समुदायों के विकास को मुख्यधारा से जोड़ने की दिशा में प्रयासों के बीच धर्मांतरण का मुद्दा एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने आ रहा है। आदिवासी समाज के प्रतिनिधियों का कहना है कि समुदाय के भीतर बढ़ते धर्म परिवर्तन को रोकना और लोगों को अपनी मूल सांस्कृतिक परंपराओं से जोड़ना समय की जरूरत बन गया है।

भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती के अवसर पर लाल किले में आयोजित जनजातीय सांस्कृतिक कार्यक्रमों में देशभर से पहुंचे आदिवासी समुदाय के लोगों ने धर्म परिवर्तन के मुद्दे को प्रमुखता से उठाया। भव्य जनजातीय शोभायात्रा और सांस्कृतिक समागम के दौरान इस विषय पर एकजुट होकर चिंता व्यक्त की गई।

अरुणाचल प्रदेश से आए कुछ प्रतिनिधियों ने कहा कि उनके राज्य में बड़ी संख्या में लोगों ने धर्म परिवर्तन कर लिया है। उनका कहना था कि कई लोग ईसाई और मुस्लिम धर्म की ओर चले गए हैं। प्रतिनिधियों ने बताया कि उनका प्रमुख उद्देश्य उन आदिवासी लोगों को पुनः अपनी मूल परंपराओं से जोड़ना है, जिन्होंने धर्म परिवर्तन किया है।

उन्होंने यह भी कहा कि जो लोग अपनी मूल पहचान से दूर जा चुके हैं, उनके जनजातीय दर्जे को लेकर पुनर्विचार होना चाहिए। प्रतिनिधियों ने मांग रखी कि ऐसे लोगों को आदिवासी वर्ग के तहत मिलने वाले लाभ और अधिकारों पर नीति के स्तर पर विचार किया जाए।

पूर्वोत्तर से पहुंचे समूह ने चिंता जताते हुए कहा कि यदि यही स्थिति जारी रही तो उनके क्षेत्रों की सांस्कृतिक पहचान प्रभावित हो सकती है। इसी उद्देश्य से वे लोगों को जागरूक करने और अपनी बात रखने के लिए कार्यक्रम में शामिल हुए हैं।

प्रतिनिधियों ने बताया कि अरुणाचल में कुछ सामाजिक संगठन धर्मांतरण के विरोध में अभियान चला रहे हैं। उनका आरोप है कि पुराने कानूनों के प्रभावी रूप से लागू नहीं होने के कारण बाहरी प्रभावों के जरिए लोगों को प्रभावित किया गया। अब समुदाय के लोग अपनी परंपराओं और पहचान को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

स्थानीय प्रतिनिधियों ने कहा कि जनजातीय समाज के अधिकार, परंपरा और सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा के लिए देशभर में जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं। उनका मानना है कि संस्कृति और परंपराओं से जुड़ाव ही समाज की पहचान को सुरक्षित रख सकता है।

उन्होंने बताया कि अरुणाचल प्रदेश में ‘एसटी बचाओ’ आंदोलन के तहत 28 से 31 मई तक बंद का आह्वान किया गया है। प्रतिनिधियों ने आरोप लगाया कि बाहरी लोगों की बढ़ती मौजूदगी और अवैध निर्माण गतिविधियों को लेकर स्थानीय स्तर पर चिंता बनी हुई है तथा प्रशासन से इस पर रोक लगाने की मांग की गई है।

प्रतिनिधियों ने पारंपरिक टोपी के महत्व का जिक्र करते हुए कहा कि यह उनकी सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। अरुणाचल प्रदेश के निशी समाज में इसे ‘बोपा’ कहा जाता है। पहले इसमें पक्षी से जुड़े पारंपरिक तत्वों का इस्तेमाल होता था, लेकिन अब नियमों के कारण लकड़ी से इसका निर्माण किया जा रहा है।

छत्तीसगढ़ से आई समाज सेविकाओं ने भी धर्म परिवर्तन को गंभीर सामाजिक विषय बताते हुए कहा कि कई क्षेत्रों में लोग दूसरे धर्मों की ओर बढ़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि मंच के माध्यम से समाज को जागरूक करने और लोगों से अपनी परंपराओं से जुड़े रहने की अपील की गई है। वहीं दंतेवाड़ा से आई एक कार्यकर्ता ने बाहरी लोगों को मिलने वाली सुविधाओं को लेकर भी चिंता जताई।

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