इंदौर, 25 मई।
हनी ट्रैप कांड का दूसरा अध्याय एक बार फिर इंदौर को कठघरे में खड़ा कर रहा है, जिससे 2019 की घटनाओं की कड़वी यादें ताजा हो गई हैं, जब इस प्रकरण ने प्रदेश की राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था को हिला दिया था। अब हनी ट्रैप-2 की चर्चा मध्य प्रदेश से लेकर छत्तीसगढ़, गुजरात और दिल्ली तक के राजनीतिक व प्रशासनिक हलकों में गूंज रही है, जहां पुराने पैटर्न पर नए चेहरे दिखाई दे रहे हैं, लेकिन तरीका पहले जैसा ही बताया जा रहा है।
इस बार गिरफ्तार श्वेता विजय जैन, रेशू चौधरी और अलका दीक्षित से पूछताछ में कई अहम तथ्य सामने आए हैं, जिससे प्रभावशाली वर्ग में बेचैनी बढ़ गई है। पुलिस जांच में रेशू के मोबाइल और अन्य डिजिटल उपकरणों से सौ से अधिक आपत्तिजनक वीडियो मिलने की बात सामने आई है, जो कथित रूप से नेताओं, अधिकारियों और कारोबारियों से जुड़े हैं। इन वीडियो के आधार पर बड़े पैमाने पर आर्थिक वसूली किए जाने और कई अन्य सौदों की तैयारी होने की जानकारी भी सामने आ रही है। यह पूरा मामला 2019 के हनी ट्रैप प्रकरण की पुनरावृत्ति जैसा बताया जा रहा है, जिसमें उस समय भी कई नाम सामने आए थे और बड़ी संख्या में वीडियो व ऑडियो क्लिप बरामद हुए थे, लेकिन कार्रवाई सीमित ही रह गई थी।
2019 के मामले के बाद भी सिस्टम से कोई ठोस सबक नहीं लिया गया, यह सवाल लगातार उठ रहा है। उस समय जिन आईएएस, आईपीएस और जनप्रतिनिधियों के नाम सामने आए थे, उन पर प्रभावी कार्रवाई न होने और मामले के धीरे-धीरे कमजोर पड़ने की बात सामने आती रही है। आरोप है कि राजनीतिक और प्रशासनिक दबाव के चलते जांच प्रभावित हुई, चार्जशीट कमजोर बनाई गई और कई गवाहों के बदलने के बाद मामला ठंडे बस्ते में चला गया। इसके चलते आरोपी जमानत पर बाहर आकर फिर से सक्रिय हो गए।
बताया जा रहा है कि पूरा तंत्र कहीं न कहीं इस नेटवर्क का हिस्सा बनता चला गया। जांच व्यवस्था में शामिल कुछ लोगों पर भी सवाल उठते रहे हैं, जिससे मामले की निष्पक्षता पर असर पड़ा। राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों की संलिप्तता की चर्चाएं भी लंबे समय से जारी हैं, जहां ट्रांसफर, पोस्टिंग और ठेकों के नाम पर ऐसे नेटवर्क को अप्रत्यक्ष सहयोग मिलने की आशंका जताई जाती रही है।
इंदौर पुलिस ने इस बार सक्रियता दिखाते हुए गैंग की गिरफ्तारी की है, लेकिन यह सवाल भी उठ रहा है कि इतने वर्षों तक यह नेटवर्क कैसे सक्रिय रहा और उस पर नजर क्यों नहीं रखी गई। 2019 के बाद निगरानी व्यवस्था कमजोर पड़ने और जमानत शर्तों के पालन पर गंभीरता से ध्यान न दिए जाने की बात भी सामने आ रही है।
जानकारों का मानना है कि ऐसे मामलों में केवल आरोपी अकेले काम नहीं करते, बल्कि इसके लिए किसी न किसी स्तर पर संरक्षण आवश्यक होता है। इसी आधार पर यह भी सवाल उठता है कि क्या इस नेटवर्क को कहीं न कहीं व्यवस्था से भी सहारा मिलता रहा है।
फिलहाल यह आशंका जताई जा रही है कि कहीं यह मामला भी 2019 की तरह सीमित कार्रवाई तक न सिमट जाए, क्योंकि अभी तक केवल गिरफ्तारियां हुई हैं और वीडियो में दिख रहे कथित प्रभावशाली लोगों के नाम सार्वजनिक नहीं किए गए हैं। पहले भी ऐसे मामलों में बड़ी सूची बनी, लेकिन अंतिम कार्रवाई सीमित रह गई।
यदि इस बार भी कार्रवाई केवल कुछ व्यक्तियों तक सीमित रहती है और बड़े स्तर पर जांच आगे नहीं बढ़ती, तो इसे व्यवस्था में समानांतर शक्ति संरचना के संकेत के रूप में देखा जाएगा, जहां प्रभाव और दबाव के आधार पर एक अलग तंत्र काम करता है।
अब मांग उठ रही है कि 2019 और वर्तमान दोनों मामलों की जांच उच्च न्यायिक निगरानी में की जाए और हर वीडियो में शामिल व्यक्ति से पूछताछ सुनिश्चित हो, चाहे वह किसी भी पद या प्रभाव का क्यों न हो। साथ ही पहले के मामले में जांच प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले लोगों की भूमिका भी तय करने की बात कही जा रही है।
फिलहाल इंदौर पुलिस ने एक महत्वपूर्ण शुरुआत की है, लेकिन असली परीक्षा अब आगे की जांच की दिशा तय करेगी। यदि इस बार भी बड़े नामों को बचाकर केवल छोटे स्तर पर कार्रवाई सीमित रह गई, तो इस तरह के मामलों की पुनरावृत्ति रोकना और कठिन हो सकता है।




.png)


.jpg)







