कोलकाता, 25 मई।
पश्चिम बंगाल के फलता विधानसभा क्षेत्र में पुनर्मतदान के बाद आए नतीजों ने राज्य की राजनीतिक परिस्थितियों में नए समीकरणों की बहस को तेज कर दिया है। इन परिणामों से यह संकेत सामने आया है कि तृणमूल कांग्रेस का मजबूत माना जाने वाला अल्पसंख्यक मतदाता आधार अब विभिन्न राजनीतिक दलों में विभाजित होता दिखाई दे रहा है। इनमें माकपा, कांग्रेस, इंडियन सेक्युलर फ्रंट तथा हुमायूं कबीर की आमजनता उन्नयन पार्टी जैसे छोटे राजनीतिक दल भी शामिल हैं।
माकपा नेता सुजन चक्रवर्ती ने कहा कि अल्पसंख्यक समुदाय अब नए राजनीतिक विकल्पों की तलाश में है, क्योंकि उसे भाजपा के विरुद्ध तृणमूल की प्रभावी लड़ाई पर भरोसा कमजोर पड़ता दिख रहा है। उन्होंने तर्क दिया कि जब बंगाल में भाजपा एक मजबूत राजनीतिक वास्तविकता के रूप में स्थापित हो चुकी है और तृणमूल को प्रभावी विपक्ष के रूप में नहीं देखा जा रहा, तो ऐसे में मतदाताओं का अन्य विकल्पों की ओर झुकाव स्वाभाविक है।
वहीं तृणमूल कांग्रेस नेता कुणाल घोष ने इन दावों को अस्वीकार करते हुए कहा कि केवल किसी एक चुनावी परिणाम के आधार पर व्यापक राजनीतिक निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है। उन्होंने दावा किया कि भाजपा के विरुद्ध तृणमूल कांग्रेस अब भी राज्य की सबसे बड़ी और प्रभावशाली राजनीतिक ताकत बनी हुई है।
फलता परिणामों के बाद भाजपा ने भी तृणमूल के कथित “डायमंड हार्बर मॉडल” पर हमले तेज कर दिए हैं। भाजपा नेताओं का कहना है कि इस नतीजे ने अभिषेक बनर्जी के राजनीतिक प्रभाव वाले क्षेत्र में संगठनात्मक अजेयता के दावों को कमजोर किया है।
भाजपा नेता अमित मालवीय ने इन परिणामों को “डायमंड हार्बर मॉडल का पतन” करार दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि यह जनादेश वर्षों से चल रही भय, हिंसा और राजनीतिक दबाव की राजनीति के विरुद्ध जनता की प्रतिक्रिया है। मालवीय के अनुसार अब अभिषेक बनर्जी के पास डायमंड हार्बर का प्रतिनिधित्व करने का नैतिक आधार नहीं रह गया है।
दूसरी ओर अभिषेक बनर्जी, जिन्होंने चुनाव प्रचार से दूरी बनाए रखी थी, ने मतगणना प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर संदेह व्यक्त किया। उन्होंने आरोप लगाया कि मतगणना में अनियमितताएं हुईं और चुनाव आयोग ने धमकी तथा कथित गड़बड़ियों की शिकायतों पर पर्याप्त कार्रवाई नहीं की।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अब मूल प्रश्न यह नहीं रह गया है कि फलता परिणाम अपवाद था या नहीं, बल्कि यह है कि क्या यह केवल तृणमूल की स्थानीय कमजोरी का संकेत है या फिर पश्चिम बंगाल की राजनीति में व्यापक पुनर्संरचना की शुरुआत है।
विश्लेषकों के अनुसार भाजपा की बंगाल रणनीति लंबे समय से दो स्तंभों पर आधारित रही है—हिंदू मतों का ध्रुवीकरण और तृणमूल के सामाजिक गठबंधन में सेंध। फलता परिणामों ने संकेत दिया है कि पहला लक्ष्य काफी हद तक सफल हुआ है, जबकि दूसरा भी अब तेजी से आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है। उल्लेखनीय है कि रविवार को हुई मतगणना में भाजपा प्रत्याशी देवांशु पांडा ने एक लाख आठ हजार मतों के अंतर से विजय दर्ज की है।















