संपादकीय
29 May, 2026

डिजिटल अव्यवस्था का शिकार होती शिक्षा व्यवस्था

सीबीएसई की ऑनस्क्रीन मार्किंग प्रणाली में सामने आई गड़बड़ियों के बीच भारत की डिजिटल शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं, जिससे छात्रों के भविष्य और परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर संकट गहराता दिख रहा है।

नई दिल्ली, 29 मई।

भारत की शिक्षा व्यवस्था में “डिजिटल सुधार” अब सुविधा से ज्यादा भय का कारण बनता जा रहा है। कभी एनटीए की परीक्षा प्रणाली सवालों के घेरे में आती है, कभी सीयूईटी अव्यवस्था का प्रतीक बन जाती है और अब सीबीएसई की ऑनस्क्रीन मार्किंग व्यवस्था ने लाखों छात्रों और अभिभावकों का भरोसा हिला दिया है। तकनीक का उद्देश्य पारदर्शिता और दक्षता बढ़ाना होता है, लेकिन यदि वही तकनीक बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने लगे, तो यह केवल तकनीकी गलती नहीं बल्कि संस्थागत लापरवाही बन जाती है।

इस वर्ष सीबीएसई ने पहली बार बड़े स्तर पर ऑनस्क्रीन मार्किंग सिस्टम लागू किया। छात्रों की उत्तर पुस्तिकाओं को स्कैन कर परीक्षकों के पास डिजिटल रूप में भेजा गया। दावा किया गया कि इससे मूल्यांकन अधिक पारदर्शी और त्रुटिरहित होगा। लेकिन परिणाम आने के बाद जो तस्वीर सामने आई, उसने पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए। कई छात्रों ने असामान्य रूप से कम अंक आने की शिकायत की। जब पुनर्मूल्यांकन के लिए उत्तर पुस्तिकाएं अपलोड हुईं, तब कुछ छात्रों को पता चला कि उनके नाम पर किसी और की कॉपी जांच दी गई थी। कल्पना कीजिए उस मानसिक स्थिति की, जब एक छात्र अपने ही भविष्य को किसी दूसरे की लिखावट में देखे।

यह केवल एक तकनीकी “मिक्स-अप” नहीं है। यह उस पीढ़ी के भरोसे पर चोट है, जिसका पूरा भविष्य इन अंकों पर निर्भर करता है। कॉलेज प्रवेश, छात्रवृत्ति, प्रतियोगी परीक्षाएं और करियर—सब कुछ इन्हीं परिणामों से तय होता है। ऐसे में यदि मूल्यांकन प्रक्रिया ही संदिग्ध हो जाए, तो छात्रों का आत्मविश्वास टूटना स्वाभाविक है। दुखद यह भी है कि गलती उजागर करने वाले छात्रों को सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग का सामना करना पड़ा, जबकि जिम्मेदार संस्थाएं लंबे समय तक सफाई देती रहीं।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि भारत की परीक्षा संस्थाएं बिना पर्याप्त परीक्षण के नई डिजिटल व्यवस्थाओं को लागू करने की इतनी जल्दबाजी क्यों दिखाती हैं? यदि पोर्टल ठीक से काम नहीं कर रहे, लॉगिन फेल हो रहे हैं, स्कैन कॉपियां धुंधली हैं और डेटा मैचिंग में त्रुटियां हैं, तो ऐसी व्यवस्था लागू ही क्यों की गई? डिजिटल ट्रांजिशन केवल सॉफ्टवेयर खरीदने से सफल नहीं होता। इसके लिए मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर, साइबर सुरक्षा, कई स्तरों पर परीक्षण और जवाबदेही जरूरी होती है।

विडंबना यह है कि देश में शिक्षा सुधार के नाम पर तकनीक को चमकदार समाधान की तरह पेश किया जाता है, लेकिन जमीनी तैयारी अक्सर अधूरी रहती है। सरकारें और संस्थाएं “डिजिटल इंडिया” का प्रचार तो करती हैं, पर यह भूल जाती हैं कि शिक्षा प्रयोगशाला नहीं है, जहां बच्चों के भविष्य पर अधूरे प्रयोग किए जाएं।

सीबीएसई की यह चूक केवल एक बोर्ड की गलती नहीं, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र के लिए चेतावनी है। तकनीक तभी उपयोगी है जब वह भरोसा पैदा करे, न कि भय। यदि संस्थाएं छात्रों को सही अंक देने की गारंटी भी नहीं दे सकतीं, तो फिर ऐसी डिजिटल व्यवस्था का औचित्य क्या रह जाता है? शिक्षा व्यवस्था में सुधार की शुरुआत तकनीक से नहीं, जिम्मेदारी और संवेदनशीलता से होनी चाहिए। 

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