काठमांडू, 01 जून।
नेपाल के विदेश मंत्रालय ने प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह के भारत के साथ भूमि विवाद संबंधी बयान पर स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि यह टिप्पणी सीमा पार भूमि उपयोग की तकनीकी अवधारणा से जुड़ी हुई है और इसे गलत तरीके से नहीं समझा जाना चाहिए।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लोक बहादुर पौडेल क्षेत्री ने सोमवार को जारी बयान में कहा कि प्रधानमंत्री की टिप्पणी सीमा स्तंभों, दशगजा क्षेत्र और सीमावर्ती भूमि उपयोग से जुड़े तकनीकी पहलुओं की ओर संकेत करती है, जिन पर विशेषज्ञ स्तर पर अध्ययन किया जा रहा है।
प्रवक्ता के अनुसार कुछ क्षेत्रों में ऐसी स्थिति सामने आई है, जहां नेपाल की ओर से उपयोग की जा रही भूमि भारतीय क्षेत्र में तथा भारत द्वारा उपयोग की जा रही भूमि नेपाल की सीमा में पड़ सकती है, जिसे सीमा पार भूमि उपयोग की तकनीकी स्थिति के रूप में देखा जाना चाहिए।
मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि नेपाल की अंतरराष्ट्रीय सीमा का निर्धारण सुगौली संधि के आधार पर किया गया है, जबकि लिपुलेख, लिम्पियाधुरा, कालापानी और सुस्ता जैसे क्षेत्रों का सीमांकन अभी भी पूर्ण नहीं हो सका है।
विदेश मंत्रालय ने यह भी कहा कि नदियों के प्रवाह में समय-समय पर होने वाले बदलाव और नदी आधारित सीमाओं के कारण कई बार ऐसी स्थितियां उत्पन्न होती हैं, जिनमें एक देश के नागरिक दूसरे देश की सीमा क्षेत्र की भूमि का उपयोग करते हैं, और इस पर तकनीकी स्तर पर निगरानी व अध्ययन जारी है।
नेपाल और भारत के तकनीकी दल सीमा स्तंभों की मरम्मत, नो-मैन्स लैंड में अतिक्रमण की जांच तथा सीमा पार भूमि उपयोग से जुड़े आंकड़ों के संकलन में लगे हुए हैं, जबकि सरकार सभी सीमा विवादों का समाधान ऐतिहासिक संधियों और द्विपक्षीय संवाद के माध्यम से करने के लिए प्रतिबद्ध है।
यह स्पष्टीकरण ऐसे समय में आया है जब प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह के बयान के बाद देश में राजनीतिक बहस तेज हो गई है और विपक्षी दलों सहित विभिन्न वर्गों में इस पर प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है, जबकि भारत की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।











