संपादकीय
02 Jun, 2026

शिक्षा पर ‘पीरियड’ का पहरा: स्वच्छता संकट के कारण स्कूल छोड़ने को मजबूर 17 फीसदी छात्राएं

मध्यप्रदेश की स्कूल व्यवस्था में स्वच्छता और बुनियादी सुविधाओं की कमी के कारण बड़ी संख्या में छात्राएं मासिक धर्म के दौरान असुविधा झेलते हुए पढ़ाई छोड़ने को मजबूर हो रही हैं, जिससे शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठे हैं।

भोपाल, 02 जून ।

मध्यप्रदेश में बालिकाओं की शिक्षा पर मासिक धर्म स्वच्छता से जुड़ी गंभीर चुनौतियां सामने आई हैं। नीति आयोग की मई 2026 की रिपोर्ट के अनुसार स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की कमी के कारण बड़ी संख्या में छात्राएं शिक्षा बीच में ही छोड़ने को मजबूर हो रही हैं, जिससे शैक्षणिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं।

रिपोर्ट में बताया गया है कि राज्य में लगभग 17 प्रतिशत लड़कियां केवल इसलिए स्कूल छोड़ देती हैं क्योंकि संस्थानों में पीरियड्स के दौरान साफ शौचालय, पानी और सैनिटरी नैपकिन जैसी आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। कक्षा 9वीं और 10वीं में करीब 16.8 प्रतिशत छात्राओं का ड्रॉपआउट दर्ज किया गया है, जबकि 11वीं और 12वीं तक पहुंचते-पहुंचते यह आंकड़ा 53 प्रतिशत तक पहुंच जाता है।

आंकड़ों के अनुसार प्रदेश के 88.6 प्रतिशत स्कूलों में बालिकाओं के लिए शौचालय उपलब्ध हैं, लेकिन शेष 11.4 प्रतिशत स्कूल आज भी इस सुविधा से वंचित हैं। कई जगह जहां शौचालय मौजूद हैं, वहां पानी, सफाई व्यवस्था और उपयोगी डिस्पोजल सिस्टम की कमी बनी हुई है, जिससे छात्राओं को गंभीर असुविधा का सामना करना पड़ता है।

प्राथमिक शिक्षा में भी गिरावट दर्ज की गई है, जहां 2014-15 में बालिकाओं का नामांकन 107.43 प्रतिशत था, जो 2024-25 में घटकर 76.4 प्रतिशत रह गया है। यह पिछले एक दशक में उल्लेखनीय गिरावट को दर्शाता है, जिससे शिक्षा प्रणाली की स्थिति पर चिंता बढ़ी है।

रिपोर्ट में यह भी उजागर किया गया है कि विभिन्न योजनाओं के बावजूद कई स्कूलों तक सैनिटरी नैपकिन की आपूर्ति नियमित रूप से नहीं पहुंच रही है। कई स्थानों पर शौचालयों का रखरखाव नहीं हो रहा और उन्हें बंद या अनुपयोगी अवस्था में छोड़ दिया गया है।

स्थानीय स्तर पर स्कूल प्रबंधन और संबंधित अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि कई संस्थानों में सुविधाएं होने के बावजूद उनका सही उपयोग सुनिश्चित नहीं किया जा रहा है। पंचायत और स्थानीय निकायों की जवाबदेही पर भी चर्चा तेज हो गई है, क्योंकि निर्माण के बाद रखरखाव की स्थिति कमजोर पाई जा रही है।

समाज में मासिक धर्म को लेकर व्याप्त झिझक और चुप्पी भी एक बड़ा कारण मानी जा रही है, जिससे छात्राओं की शिक्षा प्रभावित हो रही है। कई परिवारों में भी इस विषय पर संकोच के चलते बालिकाओं की पढ़ाई बाधित हो जाती है।

विशेषज्ञों के अनुसार साफ-सुथरे शौचालय, पानी की उपलब्धता और सैनिटरी नैपकिन जैसी सुविधाएं शिक्षा के अधिकार का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। यदि किसी छात्रा को मासिक धर्म के कारण नियमित रूप से स्कूल छोड़ना पड़े तो उसकी शिक्षा पर दीर्घकालिक असर पड़ता है।

रिपोर्ट में यह भी सुझाव दिया गया है कि सभी स्कूलों में मूलभूत स्वच्छता सुविधाएं अनिवार्य रूप से सुनिश्चित की जाएं तथा नियमित निगरानी और सामाजिक ऑडिट के माध्यम से व्यवस्था को मजबूत किया जाए। साथ ही ड्रॉपआउट हो चुकी छात्राओं को पुनः शिक्षा से जोड़ने के लिए विशेष प्रयास किए जाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया है।

बालिका शिक्षा और स्वच्छता से जुड़ी यह स्थिति शिक्षा व्यवस्था के सामने गंभीर चुनौती के रूप में उभर रही है, जिस पर तत्काल प्रभावी कदम उठाने की आवश्यकता बताई जा रही है।

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