नई दिल्ली, 08 जून।
देश की सबसे प्रतिष्ठित मेडिकल प्रवेश परीक्षा नीट-यूजी एक बार फिर विवादों के केंद्र में है। पेपर लीक के आरोपों और परीक्षा रद्द होने के बाद पैदा हुई अनिश्चितता ने लाखों छात्रों और उनके परिवारों को मानसिक तनाव के ऐसे दौर में धकेल दिया है, जिसकी कीमत कई युवा अपनी जान देकर चुका रहे हैं। यही कारण है कि जंतर-मंतर पर प्रस्तावित प्रदर्शन को केवल एक राजनीतिक विरोध या किसी मंत्री के इस्तीफे की मांग के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह उस व्यापक असंतोष की अभिव्यक्ति है, जो देश के युवाओं के भीतर लगातार जमा हो रहा है।
इस वर्ष 22 लाख से अधिक छात्रों ने नीट-यूजी परीक्षा दी थी। मेडिकल कॉलेज में प्रवेश का सपना लेकर वर्षों तक कठिन परिश्रम करने वाले इन छात्रों के लिए परीक्षा केवल एक टेस्ट नहीं, बल्कि उनके जीवन की दिशा तय करने वाला अवसर होती है। ऐसे में जब परीक्षा की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं और उसे रद्द करने जैसी नौबत आती है, तो सबसे बड़ा आघात छात्रों के विश्वास पर पड़ता है।
सबसे चिंताजनक पहलू छात्रों की आत्महत्या की बढ़ती घटनाएं हैं। पिछले कुछ वर्षों में नीट से जुड़ी आत्महत्याओं के आंकड़े लगातार चिंता बढ़ा रहे हैं। कोटा से लेकर बिहार, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु तक ऐसी घटनाएं सामने आई हैं, जिन्होंने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था सफलता और असफलता के बीच संतुलन बनाने में पूरी तरह विफल हो रही है? परीक्षा रद्द होने के बाद भी कई छात्रों द्वारा आत्महत्या किए जाने की खबरें इस संकट की गंभीरता को और बढ़ा देती हैं।
इसी पृष्ठभूमि में उभरी कॉकरोच जनता पार्टी एक प्रतीक बन गई है। यह केवल एक संगठन नहीं, बल्कि उस पीढ़ी की निराशा और व्यंग्यात्मक प्रतिरोध का चेहरा है, जिसे लगता है कि उसकी समस्याओं को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा। सोशल मीडिया पर इसकी लोकप्रियता यह संकेत देती है कि युवाओं के भीतर व्यवस्था के प्रति असंतोष कितना गहरा है। जब कोई आंदोलन कुछ ही दिनों में करोड़ों लोगों तक पहुंच जाता है, तो उसे केवल इंटरनेट की सनसनी कहकर खारिज नहीं किया जा सकता।
किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध और प्रदर्शन नागरिक अधिकार हैं, लेकिन समाधान केवल सड़कों पर नहीं मिलेगा। सरकार को परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता बहाल करने के लिए पारदर्शी और त्वरित कार्रवाई करनी होगी। यदि कहीं पेपर लीक या अनियमितता हुई है, तो उसकी निष्पक्ष जांच और दोषियों पर कठोर कार्रवाई अनिवार्य है। साथ ही छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को शिक्षा नीति का केंद्रीय विषय बनाना होगा। प्रतिस्पर्धा के इस दौर में केवल करियर की तैयारी पर्याप्त नहीं, बल्कि भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक सहयोग भी उतना ही आवश्यक है।
भारत की युवा आबादी देश की सबसे बड़ी ताकत है। यदि यही वर्ग व्यवस्था पर से भरोसा खोने लगे, तो यह केवल शिक्षा का संकट नहीं, बल्कि सामाजिक और राष्ट्रीय चिंता का विषय बन जाता है। परीक्षा प्रणाली का उद्देश्य अवसर प्रदान करना है, निराशा पैदा करना नहीं। इसलिए आज जरूरत केवल दोष तय करने की नहीं, बल्कि उस भरोसे को पुनर्स्थापित करने की है, जो लाखों छात्र अपने भविष्य के साथ इस व्यवस्था पर करते हैं।
कोई भी परीक्षा जीवन से बड़ी नहीं हो सकती। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि एक निष्पक्ष और विश्वसनीय परीक्षा व्यवस्था ही युवाओं को यह विश्वास दिला सकती है कि उनके सपनों की कीमत समझी जा रही है। जंतर-मंतर का आक्रोश इसी भरोसे की मांग है।














