सुप्रीम कोर्ट ने जमानत याचिकाओं की सुनवाई में देरी को गंभीर चिंता का विषय बताते हुए इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता के उल्लंघन के रूप में चिह्नित किया और हाई कोर्ट को समयबद्ध निपटारे के लिए कई अहम निर्देश जारी किए।
14 मई।
देश में न्याय की सबसे बड़ी विडंबना यही रही है कि फैसला आने से पहले ही अभियुक्त सजा काट चुका होता है। लंबित मामलों की चर्चा आम थी, लेकिन अब चिंता का नया केंद्र बन गई हैं हाई कोर्ट में लंबित जमानत याचिकाएं। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा है कि जमानत मामलों की सुनवाई में अत्यधिक देरी न केवल न्याय व्यवस्था के लिए, बल्कि नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिए भी खतरनाक है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जयमाला बागची की पीठ ने स्पष्ट किया कि जमानत याचिकाओं पर समय पर सुनवाई न होना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है। यह टिप्पणी महज कानूनी टिप्पणी नहीं, बल्कि पूरी न्याय व्यवस्था के लिए आईना है।
भारतीय संविधान में व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सर्वोच्च स्थान दिया गया है, लेकिन हकीकत यह है कि हजारों विचाराधीन कैदी वर्षों से जेलों में बंद हैं, केवल इसलिए कि उनकी जमानत याचिका पर सुनवाई नहीं हो पा रही। कई मामलों में तो आरोप तय नहीं हुए, जांच पूरी नहीं हुई, लेकिन व्यक्ति जेल में सड़ रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने सही कहा कि जब तक जमानत याचिका का निपटारा नहीं होता, तब तक व्यक्ति को “दोषी” मानकर जेल में रखना न्याय का उपहास है। “बेल इज रूल, जेल इज एक्सेप्शन” का सिद्धांत केवल कानून की किताबों में नहीं रहना चाहिए, बल्कि अदालतों के व्यवहार में भी उतरना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने इस समस्या के समाधान के लिए हाई कोर्ट को कई ठोस निर्देश दिए हैं। सबसे महत्वपूर्ण है ऑटोमेटेड सॉफ्टवेयर सिस्टम अपनाना। मैन्युअल लिस्टिंग और तारीखों के खेल ने ही लंबित मामलों की संख्या बढ़ाई है। यदि जमानत याचिका दायर होते ही वह स्वचालित रूप से एक सप्ताह के भीतर सूचीबद्ध हो जाए, तो आधे से अधिक समस्या हल हो सकती है। दूसरा निर्देश यह है कि जमानत याचिका की प्रति अनिवार्य रूप से महाधिवक्ता को दी जाए। अक्सर सरकारी वकील जवाब तैयार न होने का बहाना कर तारीख बढ़वाते हैं। यदि प्रारंभ में ही प्रति उपलब्ध होगी, तो अनावश्यक देरी पर रोक लगेगी।
अदालत ने यह भी कहा है कि सुनवाई से पहले पुलिस या जांच एजेंसियों से स्टेटस रिपोर्ट मंगाई जाए। इससे बार-बार “जांच जारी है” कहकर तारीख बढ़ाने की प्रवृत्ति रुकेगी। यदि किसी दिन सुनवाई नहीं हो पाती, तो मामला अगले उपलब्ध दिन सूचीबद्ध हो। हर सप्ताह या अधिकतम 15 दिन के भीतर सुनवाई सुनिश्चित करना आवश्यक है।
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट से यह भी कहा है कि वे जमानत याचिकाओं के निपटारे के लिए अधिकतम समय सीमा तय करें। नई याचिकाओं को एक सप्ताह के भीतर सूचीबद्ध किया जाए और लंबित मामलों को प्राथमिकता के आधार पर निपटाया जाए। यह निर्देश केवल कागजी आदेश बनकर न रह जाए, इसके लिए हाई कोर्ट को जवाबदेह बनाना होगा।
समस्या केवल न्यायाधीशों की संख्या या काम के बोझ तक सीमित नहीं है। डिजिटल प्रबंधन, ई-फाइलिंग और केस मैनेजमेंट सिस्टम को गंभीरता से लागू करना होगा। कुछ हाई कोर्ट ने पहले ही “फास्ट ट्रैक बेल बेंच” बनाकर प्रयोग किए हैं। सुप्रीम कोर्ट का निर्देश इसे पूरे देश में लागू करने का मार्ग प्रशस्त कर सकता है।
साथ ही पुलिस और जांच एजेंसियों को भी जवाबदेह बनाना होगा। स्टेटस रिपोर्ट समय पर देना उनकी जिम्मेदारी है। यदि एजेंसियां जानबूझकर देरी करती हैं, तो उन पर कार्रवाई का प्रावधान होना चाहिए। जमानत का अर्थ दोषमुक्ति नहीं होता, यह केवल यह सुनिश्चित करता है कि मुकदमा चलने तक व्यक्ति जेल के बाहर रहे। लेकिन समाज में “जेल गया मतलब दोषी” वाली मानसिकता अब भी हावी है। इसी सोच के कारण कई बार अदालतें भी जमानत देने में हिचकती हैं।
सुप्रीम कोर्ट का यह कदम स्वागतयोग्य है। यह केवल जमानत याचिकाओं तक सीमित नहीं, बल्कि पूरी न्याय व्यवस्था को संदेश देता है कि समय पर न्याय देना अदालत का कर्तव्य है, एहसान नहीं। यदि इन निर्देशों को गंभीरता से लागू किया गया, तो लाखों विचाराधीन कैदियों को राहत मिलेगी, जेलों का बोझ कम होगा और जनता का भरोसा भी लौटेगा। न्याय वही सार्थक है, जो समय पर मिले, अन्यथा स्वतंत्रता का अधिकार केवल संविधान की सजावटी पंक्ति बनकर रह जाएगा।