हाल के दिनों में न्यायपालिका और न्यायिक निष्पक्षता को लेकर एक महत्वपूर्ण बहस सामने आई है। यह बहस तब तेज हुई, जब एक चर्चित मामले में आरोपी पक्ष द्वारा सुनवाई कर रहे न्यायाधीश पर पक्षपात के आरोप लगाते हुए उन्हें मामले से हटाने की मांग की गई। इस घटनाक्रम ने एक व्यापक सवाल खड़ा कर दिया है—क्या किसी आरोपी को यह अधिकार है कि वह अपने मामले की सुनवाई कर रहे जज को बदलने की मांग कर सके।
न्यायिक प्रणाली में निष्पक्षता का महत्व भारतीय न्याय प्रणाली का एक मूल सिद्धांत है। निष्पक्ष न्याय का अर्थ है कि न केवल न्याय होना चाहिए, बल्कि यह भी दिखना चाहिए कि न्याय निष्पक्ष तरीके से हो रहा है। यदि किसी पक्ष को यह लगता है कि न्यायाधीश पक्षपाती हैं या उनके निर्णय पहले से प्रभावित हैं, तो यह न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ माना जाता है।
इसी सिद्धांत के तहत “नैचुरल जस्टिस” का नियम आता है, अर्थात कोई भी व्यक्ति अपने ही मामले में न्यायाधीश नहीं हो सकता। इसी से जुड़ा एक और पहलू है कि न्यायाधीश को किसी भी प्रकार के पूर्वाग्रह से मुक्त रहना चाहिए।
क्या जज को हटाने की मांग कानूनी रूप से संभव है? हाँ, भारतीय कानून में ऐसी व्यवस्था मौजूद है, जिसे (स्वयं को अलग करना) कहा जाता है। इसके तहत कोई न्यायाधीश स्वयं यह निर्णय ले सकता है कि वह किसी मामले की सुनवाई नहीं करेगा, यदि उसे लगता है कि उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठ सकता है।
आरोपी या पक्षकार अदालत के समक्ष आवेदन देकर यह आग्रह कर सकता है कि संबंधित जज मामले से स्वयं को अलग करें। हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि जज को हटाने का निर्णय अंततः उसी न्यायाधीश या उच्च न्यायालय के विवेक पर निर्भर करता है। केवल आरोप लगा देने से जज को हटाया नहीं जा सकता।