समापन समारोह में कैबिनेट मंत्री प्रदीप बत्रा सहित देशभर से आए संत, धर्माचार्य और शिक्षाविद शामिल हुए। सम्मेलन के दौरान 24 विद्वानों को श्रेष्ठ शोध पत्र पुरस्कार दिए गए। 35 पुस्तकों का विमोचन हुआ और 92 पुस्तक एवं प्रदर्शनी स्टॉल लगाए गए। सम्मेलन अध्यक्ष श्रीनिवास वरखेड़ी ने स्वामी रामदेव को विद्याधिपति-प्रशस्ति-पत्रम भेंट किया। आचार्य बालकृष्ण को महामहोपाध्याय, प्रति कुलपति डॉ. देवप्रिया को महाआचार्या और डॉ. शिवानी वी. को व्याकरण पंडिता सम्मान से सम्मानित किया गया। प्रो. अरुण रंजन मिश्रा को सम्मेलन का नया अध्यक्ष मनोनीत किया गया।
विक्रम संवत को राष्ट्रीय जीवन में अपनाने पर जोर
स्वामी रामदेव ने भारतीय पंचांग और विक्रम संवत को राष्ट्रीय जीवन में व्यापक रूप से अपनाने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि सनातन संस्कृति अहिंसा, सत्य, सद्भाव और मानव कल्याण का दर्शन है। शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार तक सीमित न होकर नैतिक मूल्यों और सांस्कृतिक चेतना का विकास भी होना चाहिए।
सनातन शास्त्र शुद्धि समिति का गठन
आचार्य बालकृष्ण ने बताया कि सम्मेलन में विभिन्न मत-पंथों के संतों को एक मंच पर लाकर सनातन शास्त्र शुद्धि समिति का गठन किया गया। भारतीय शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष एनपी सिंह ने भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक विज्ञान में समन्वय पर जोर दिया। शांभवी पीठाधीश्वर स्वामी आनंद स्वरूप ने गुरुकुल शिक्षा को व्यापक स्तर पर अपनाने और 8 से 11 वर्ष के बच्चों के लिए इसे अनिवार्य करने का सुझाव दिया।
सम्मेलन में 26 राज्यों से 1800 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। इनमें 552 शिक्षक, 467 शोधार्थी और 403 विद्यार्थी शामिल थे। पांच नए शोध विषय जोड़े गए और तीन नई पुरस्कार श्रेणियां शुरू की गईं। तीन दिनों में 100 से अधिक सांस्कृतिक प्रस्तुतियां हुईं। प्रति कुलपति साध्वी देवप्रिया ने सम्मेलन की आख्या प्रस्तुत की।















