13 मई।
तमिलनाडु की राजनीति में सोना अब केवल आभूषण नहीं, बल्कि चुनावी वादा बन गया है। एक ओर तमिलागा वेत्री कषगम के प्रमुख विजय ने घोषणा की है कि सत्ता में आने पर गरीब परिवारों की बेटियों की शादी में आठ ग्राम सोना मुफ्त दिया जाएगा। दूसरी ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीन दिन के भीतर ही देश से अपील की है कि अगले एक वर्ष तक विवाह और उपहारों के लिए सोना न खरीदा जाए। दोनों बयानों के बीच आम जनता असमंजस में है। एक तरफ एक लाख रुपये की राहत दिख रही है, तो दूसरी तरफ ‘राष्ट्रहित’ की जिम्मेदारी।
तमिलागा वेत्री कषगम ने 16 अप्रैल 2026 को जारी अपने घोषणा पत्र में महिलाओं के कल्याण को केंद्र में रखा। पार्टी ने कहा कि पांच लाख रुपये से कम वार्षिक आय वाले परिवारों की बेटियों के विवाह पर आठ ग्राम सोना और एक रेशमी साड़ी निःशुल्क दी जाएगी। वर्तमान में 22 कैरेट सोने का बाजार भाव लगभग 12,500 रुपये प्रति ग्राम है। इस हिसाब से आठ ग्राम सोने का मूल्य करीब एक लाख रुपये बैठता है। पार्टी ने यह भी वादा किया कि महिलाओं को 2,500 रुपये मासिक सहायता, छह निःशुल्क एलपीजी सिलेंडर, स्कूल छोड़ने से रोकने के लिए 15,000 रुपये वार्षिक सहायता और महिला स्वयं सहायता समूहों को पांच लाख रुपये तक ब्याजमुक्त ऋण दिया जाएगा।
कृषकों के लिए फसल ऋण माफी, धान का समर्थन मूल्य 3,500 रुपये प्रति क्विंटल, युवाओं के लिए पांच लाख सरकारी नौकरियां और पांच लाख इंटर्नशिप का वादा भी किया गया। स्वास्थ्य क्षेत्र में 25 लाख रुपये तक का पारिवारिक स्वास्थ्य बीमा और मादक पदार्थ मुक्त तमिलनाडु का संकल्प भी शामिल है।
10 मई 2026 को हैदराबाद में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि देश के नागरिकों को अगले एक साल तक विवाह के लिए सोना खरीदने से बचना चाहिए। उनका तर्क आर्थिक है। पश्चिम एशिया में उत्पन्न संघर्ष और होरमुज जलडमरूमध्य में तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतें 70 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 126 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं। भारत अपनी 85 प्रतिशत तेल जरूरतें आयात करता है और विश्व में सोने का सबसे बड़ा उपभोक्ता भी है। दोनों का भुगतान डॉलर में होता है। जब तेल और सोने का आयात एक साथ बढ़ता है तो देश पर डॉलर की मांग बढ़ती है, रुपये पर दबाव पड़ता है और विदेशी मुद्रा भंडार पर असर पड़ता है।
प्रधानमंत्री ने कहा कि जिस प्रकार कोरोना काल में ‘वर्क फ्रॉम होम’ अपनाकर हमने देश को बचाया, उसी प्रकार अब ईंधन बचत और सोने की खपत घटाकर विदेशी मुद्रा की रक्षा करनी होगी।
टीवीके का तर्क है कि तमिलनाडु में विवाह में सोना सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक है। गरीब परिवार अक्सर कर्ज लेकर भी 20 से 50 ग्राम सोना देते हैं। आठ ग्राम मुफ्त मिलने से एक मध्यमवर्गीय परिवार पर कम से कम एक लाख रुपये का बोझ कम होगा। पार्टी इसे महिला सम्मान और सामाजिक न्याय से जोड़ रही है।
केंद्र का कहना है कि भारत प्रतिवर्ष 700 से 800 टन सोना आयात करता है। यदि लोग एक वर्ष तक सोना न खरीदें तो खपत लगभग 500 टन तक घट सकती है। इससे अरबों डॉलर की बचत होगी, जिसे तेल और अन्य आवश्यक आयातों में लगाया जा सकता है।
यदि टीवीके सरकार बनाती है और योजना लागू करती है तो राज्य पर सालाना 1,600 से 2,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त भार पड़ेगा। अनुमान है कि तमिलनाडु में प्रतिवर्ष चार से पांच लाख विवाह होते हैं। यदि 40 प्रतिशत परिवार पात्र होते हैं तो 1.6 से 2 लाख बेटियों को आठ ग्राम सोना देना होगा। केंद्र सरकार सोने के आयात को कम करना चाहती है। ऐसे में एक राज्य द्वारा हजारों किलो सोना खरीदकर बांटना केंद्र की नीति के विपरीत होगा। इससे केंद्र और राज्य के बीच टकराव की आशंका बढ़ गई है। पहले भी तमिलनाडु की मुफ्त योजनाओं पर केंद्र सवाल उठाता रहा है। सोना सीधे विदेशी मुद्रा से जुड़ा है, इसलिए विवाद और गहरा हो सकता है।
प्रधानमंत्री की अपील के बाद मुंबई के जावेरी बाजार, दिल्ली के चांदनी चौक और कोलकाता के बाजारों में मांग में गिरावट देखी गई है। ज्वेलर्स का कहना है कि विवाह का मौसम ही उनकी आय का आधार है। यदि लोग सोना न खरीदें तो मांग में 30 से 40 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है। इसका असर बड़े शोरूम के साथ-साथ हजारों कारीगरों, सुनारों और छोटे कारखानों पर पड़ेगा।
कन्फेडरेशन ऑफ ट्रेडर्स इंडिया के अध्यक्ष बृजेश गोयल ने कहा कि इस अपील ने पूरे आभूषण क्षेत्र में हलचल मचा दी है। यदि टीवीके की योजना लागू होती है तो सरकारी खरीद से ज्वेलर्स को कुछ राहत मिल सकती है, लेकिन सवाल यह है कि सरकार सोना खुले बाजार से खरीदेगी या रिजर्व बैंक के भंडार से।
आम जनता सबसे अधिक असमंजस में है। गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए एक लाख रुपये का सोना मुफ्त मिलना बड़ी राहत है। कई परिवारों के लिए यह वर्षों की बचत के बराबर है।
दूसरी ओर प्रधानमंत्री की अपील को ‘देशहित’ के नाम पर नजरअंदाज करना भी आसान नहीं है। सामाजिक माध्यम पर इस मुद्दे को लेकर लगातार बहस चल रही है। तमिलनाडु में स्थिति और अधिक पेचीदा है। यहां विवाह में सोना लगभग अनिवार्य माना जाता है। यदि टीवीके सरकार बनाती है और योजना लागू होती है तो लोग केंद्र की अपील को नजरअंदाज कर सकते हैं, लेकिन यदि केंद्र वित्तीय सहायता रोक दे तो योजना अधर में लटक सकती है।
तमिलनाडु में मुफ्त योजनाओं का इतिहास पुराना है। एमजीआर के समय से ही मिक्सी, ग्राइंडर और साड़ी जैसी योजनाएं चलती रही हैं, लेकिन सोना अलग विषय है। यह आयात आधारित वस्तु है और सीधे व्यापक अर्थव्यवस्था से जुड़ा है। वर्ष 2016 में नोटबंदी के समय भी सोने की खरीद पर सवाल उठे थे। वर्ष 2020 में कोरोना काल में ‘लोकल फॉर वोकल’ का नारा दिया गया था। अब 2026 में ‘नो गोल्ड फॉर वन ईयर’ उसी कड़ी का हिस्सा माना जा रहा है।
यदि टीवीके और केंद्र आमने-सामने आते हैं तो मामला सर्वोच्च न्यायालय तक जा सकता है, जैसा कि कर्नाटक में मुफ्त बिजली और जीएसटी मुआवजे को लेकर हुआ था।
विशेषज्ञों का मानना है कि टकराव टालने के लिए तीन रास्ते हो सकते हैं। पहला, टीवीके योजना में सोने की जगह ‘सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड’ या ‘गोल्ड सेविंग सर्टिफिकेट’ दिए जाएं। इससे परिवारों को भावनात्मक संतुष्टि भी मिलेगी और आयात भी नहीं बढ़ेगा।
दूसरा, केंद्र और राज्य मिलकर ‘गोल्ड रीसाइक्लिंग’ नीति बनाएं। पुराने आभूषणों को रिसाइकल कर नई योजनाओं में इस्तेमाल किया जाए। तीसरा, जनजागरूकता अभियान चलाकर लोगों को समझाया जाए कि भावनात्मक मूल्य नई खरीद से अधिक महत्वपूर्ण हैं। वर्ष 2026 को ‘मीनिंगफुल वेडिंग’ का वर्ष बनाया जा सकता है।
तमिलनाडु का चुनाव परिणाम जो भी हो, यह स्पष्ट है कि सोना अब केवल आभूषण नहीं रहा। यह वोट है, विदेशी मुद्रा है और भावना भी है। टीवीके का वादा गरीब बेटियों के लिए राहत है, जबकि प्रधानमंत्री की अपील राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के लिए आवश्यक बताई जा रही है। लेकिन दोनों के बीच फंसी जनता के पास सीमित विकल्प हैं। वह या तो वादे पर भरोसा करे या अपील मानकर त्याग करे।
राष्ट्र तभी मजबूत होगा जब केंद्र और राज्य मिलकर नीति बनाएंगे। अन्यथा सोने की चमक में जनता की उम्मीदें धुंधली पड़ जाएंगी। मुद्दा केवल सोने का नहीं, बल्कि भरोसे का है। और भरोसा तभी बचेगा, जब वादा और अपील दोनों जमीन पर उतरें।