नई दिल्ली, 13 अप्रैल 2026।
कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कहा है कि देश में चल रही राजनीतिक बहस का केंद्र महिला आरक्षण नहीं, बल्कि परिसीमन होना चाहिए, क्योंकि पारदर्शी प्रक्रिया, स्पष्ट मानकों और व्यापक सहमति के बिना किया गया परिसीमन राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व संतुलन को बिगाड़ सकता है और संघीय ढांचे तथा संवैधानिक व्यवस्था पर भी गंभीर प्रभाव डाल सकता है।
उन्होंने इसे एक अत्यंत गंभीर और दूरगामी असर वाला विषय बताया।
अपने एक अंग्रेजी अखबार में लिखे लेख में सोनिया गांधी ने कहा कि सरकार महिला आरक्षण के मुद्दे को प्रमुखता देकर वास्तविक चिंता से ध्यान भटकाने का प्रयास कर रही है, जबकि महिला आरक्षण का प्रावधान पहले ही पारित किया जा चुका है, लेकिन उसके क्रियान्वयन को जनगणना और परिसीमन प्रक्रिया से जोड़कर अनावश्यक रूप से विलंबित किया जा रहा है।
उन्होंने आगे लिखा कि वर्ष 2023 में पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम के तहत लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं को एक-तिहाई आरक्षण देने का प्रावधान है, लेकिन इसे लागू करने के लिए आगामी जनगणना और उसके बाद परिसीमन को अनिवार्य कर दिया गया है, जबकि राजनीतिक इच्छाशक्ति होने पर इसे पहले भी लागू किया जा सकता था।
सोनिया गांधी ने यह भी कहा कि परिसीमन की प्रक्रिया को लेकर अब तक कोई स्पष्ट आधिकारिक रूपरेखा सामने नहीं आई है और यह केवल जनसंख्या के आधार पर सीटों के बंटवारे का विषय नहीं है, बल्कि इसमें राजनीतिक और क्षेत्रीय संतुलन का ध्यान रखना भी आवश्यक है ताकि जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों के साथ अन्याय न हो।
उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि जनगणना में लगातार हो रही देरी के कारण कई सरकारी योजनाओं और अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है तथा राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून जैसे प्रावधानों का लाभ भी पूरी तरह से जनता तक नहीं पहुंच पा रहा है।
सोनिया गांधी ने कहा कि सरकार द्वारा विशेष सत्र बुलाने में जल्दबाजी दिखाई जा रही है, जबकि इतने महत्वपूर्ण विषय पर सभी दलों के साथ पहले विस्तृत चर्चा आवश्यक है, क्योंकि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सहमति और संवाद अनिवार्य होते हैं।
अंत में उन्होंने कहा कि सरकार को सभी राजनीतिक दलों के साथ बैठक कर इस विषय पर स्पष्टता लानी चाहिए और उसके बाद ही किसी संवैधानिक संशोधन की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।




.jpg)
_(1).jpg)

.jpg)





