नई दिल्ली, 8 जून।
सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि दो अविवाहित वयस्कों के बीच आपसी सहमति से बने संबंधों को किसी व्यक्ति के चरित्र या नैतिकता का पैमाना नहीं माना जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जो दो बालिग और अविवाहित व्यक्तियों को अपनी इच्छा से संबंध बनाने से रोकता हो।
यह टिप्पणी तेलंगाना राज्य स्तरीय पुलिस भर्ती बोर्ड से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान की गई। मामले में एक उम्मीदवार की नियुक्ति को कथित नैतिक अधमता के आधार पर निरस्त कर दिया गया था, जिसके खिलाफ उसने न्यायालय का रुख किया था।
अदालत के समक्ष प्रस्तुत रिकॉर्ड के अनुसार वर्ष 2014 में उम्मीदवार के खिलाफ विवाह का आश्वासन देकर दुष्कर्म का मामला दर्ज कराया गया था। भर्ती बोर्ड ने इस आरोप को गंभीर मानते हुए उसकी नियुक्ति रद्द कर दी थी।
सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि शिकायतकर्ता और उम्मीदवार एक-दूसरे को लंबे समय से जानते थे तथा दोनों के बीच संबंध भी रहे थे। बाद में दोनों पक्षों के बीच समझौता हो गया और मामला लोक अदालत में समाप्त हो गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल किसी संबंध का समाप्त हो जाना अपने आप में धोखाधड़ी या आपराधिक आचरण नहीं माना जा सकता। अदालत ने यह भी दोहराया कि जब तक किसी आरोप को न्यायिक प्रक्रिया में सिद्ध नहीं किया जाता, तब तक व्यक्ति को निर्दोष माना जाता है।
न्यायालय ने कहा कि बिना पर्याप्त और प्रमाणित आधार के किसी व्यक्ति के चरित्र को लेकर नकारात्मक निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है। ऐसे मामलों में तथ्यों और न्यायिक निष्कर्षों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
अदालत ने तेलंगाना हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए संबंधित उम्मीदवार की नियुक्ति पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया। इस निर्णय के बाद उसके पुलिस भर्ती में नियुक्ति का रास्ता साफ हो गया है।














