संपादकीय
16 Jun, 2026

संविधान, लोकतंत्र पर सवाल: हताशा में संवैधानिक संस्थाओं पर हमले

मीनाक्षी नटराजन के नामांकन विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद कांग्रेस द्वारा चुनाव आयोग और न्यायिक संस्थाओं पर उठाए गए सवालों ने लोकतांत्रिक व्यवस्था और संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

नई दिल्ली, 16 जून।

कांग्रेस की राज्यसभा प्रत्याशी मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द करने पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला आज सुनाया है, लेकिन कांग्रेस ने तो अपना फैसला कल ही सुना दिया था। कांग्रेस राज्यसभा सीट चोरी का आरोप लगा रही है। इस कथित चोरी में रिटर्निंग ऑफिसर, चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट को भी शामिल बता रही है। सुप्रीम कोर्ट पर राज्यसभा सीट चोरी में शामिल होने का आरोप किसी सामान्य नेता का नहीं, बल्कि कांग्रेस के ऐसे नेता का है जो मध्यप्रदेश में 10 वर्षों तक मुख्यमंत्री रहे हैं तथा लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभा के सदस्य भी रह चुके हैं।

सीट चोरी की बात तो राहुल गांधी भी कर रहे हैं। अब सुप्रीम कोर्ट ने मीनाक्षी नटराजन की याचिका भी खारिज कर दी है। सुप्रीम कोर्ट ने रिटर्निंग ऑफिसर के निर्णय को सही माना है। चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए कहा कि प्रक्रिया के अनुसार रिटर्निंग ऑफिसर के फैसले में आयोग हस्तक्षेप नहीं कर सकता। इसके विपरीत कांग्रेस लगातार कह रही है कि चुनाव आयोग वोट चोरी और सीट चोरी में शामिल है। उसके पास रिटर्निंग ऑफिसर का निर्णय बदलने का अधिकार है, लेकिन वह जानबूझकर लोकतंत्र की हत्या कर रहा है।

कांग्रेस के मुताबिक देश में सब कुछ खत्म हो गया है। चुनाव आयोग सरकार के इशारे पर चोरी कर रहा है और सुप्रीम कोर्ट भी उसमें शामिल है। देश की अदालतों पर सबको भरोसा है। यदि कांग्रेस को भरोसा नहीं है तो उसे अदालत में जाने का प्रयास भी नहीं करना चाहिए। जब कोर्ट का फैसला पक्ष में आए तो अदालत निष्पक्ष और जब फैसला खिलाफ हो तो उसकी नीयत पर सवाल उठाना उचित नहीं कहा जा सकता। मानहानि के मामले में सजा के बाद राहुल गांधी की लोकसभा सदस्यता कानूनी प्रक्रिया के तहत समाप्त हुई थी, लेकिन उन्हें राहत भी सुप्रीम कोर्ट से ही मिली थी।

अदालतों में तमाम खामियां हो सकती हैं, लेकिन आज भी सबसे विश्वसनीय संस्था वही हैं। कोई भी व्यवस्था रूल ऑफ लॉ स्थापित करने के लिए होती है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया में राजनीतिक दलों की भूमिका भी रूल ऑफ लॉ के दायरे में ही होनी चाहिए।

सत्ता की आकांक्षा में कांग्रेस अराजकता को प्रोत्साहित करती दिखाई पड़ रही है। सरकार की आलोचना को राजनीतिक प्रक्रिया माना जा सकता है, लेकिन अदालतों और संवैधानिक संस्थाओं पर मिलीभगत से चोरी जैसे आरोप लगाना व्यवस्था के विरोध में एक सोचा-समझा कदम माना जाएगा।

सिस्टम से नाराजगी सामान्य प्रक्रिया है, लेकिन सिस्टम पर अविश्वास जताते हुए उसके खिलाफ विद्रोह को प्रोत्साहित करना आपराधिक प्रवृत्ति है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया में जनता कांग्रेस को बार-बार पराजित कर इस अराजक नैरेटिव को भी लगातार नकार रही है। इसके बावजूद संविधान की संस्थाओं की गरिमा को जिस प्रकार चोट पहुंचाई जा रही है, उस पर अब वैधानिक कदम उठाने का समय आ गया है।

कांग्रेस नेताओं में यह साहस राहुल गांधी की सोच से शायद आता है। सर्वाधिक मानहानि के मुकदमे झेलने वाले राहुल गांधी देश के अकेले नेता हैं। वे मानहानि के मामलों के अभ्यस्त हैं। अब दूसरे नेता भी कोर्ट को चोरी का आरोपी बता रहे हैं। राहुल गांधी ने जब "चौकीदार चोर है" का अभियान चलाया था, तब उन्होंने अपने राजनीतिक अभियान में कहा था कि अब तो सुप्रीम कोर्ट भी मान रहा है कि चौकीदार चोर है। उनके इस बयान पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए उन्हें माफी मांगने के लिए मजबूर किया था।

लोकतंत्र और संविधान की रक्षा का दायित्व सुप्रीम कोर्ट पर ही है। उसकी मर्यादा और गरिमा को कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी द्वारा खंडित करने का प्रयास किया जाता है तो इसे साधारण राजनीतिक प्रक्रिया मानकर छोड़ा नहीं जा सकता। नक्सली सोच भी यही होती है। राजनीतिक विरोध समझा जा सकता है, किसी निर्णय का विरोध भी जायज है, लेकिन रूल ऑफ लॉ के अंतर्गत अंतिम निर्णय देने वाली संस्था पर अविश्वास जताना पूरी व्यवस्था को कमजोर करने जैसा है।

नामांकन और चुनाव रद्द होना कोई नई बात नहीं है। मीनाक्षी नटराजन के मामले में 12 जून को फैसला आया है। यह ऐतिहासिक तिथि भी है। 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का चुनाव अनैतिक आचरण के आरोप में रद्द कर दिया था। अदालत के फैसले के राजनीतिक प्रभाव को रोकने के लिए देश में आपातकाल लगाया गया था। इंदिरा गांधी को बाद में राहत भी न्यायालय से ही मिली थी। अब जब कांग्रेस स्वयं कोर्ट को सीट चोरी में शामिल होने के लिए जिम्मेदार मान रही है तो यह भी सोचना पड़ेगा कि कहीं सत्ता की भूख में वह पूरी व्यवस्था को अराजक और विद्रोही बनाने का प्रयास तो नहीं कर रही।

प्रतिभाओं का दमन कांग्रेस के पतन का बड़ा कारण रहा है। कांग्रेस आपात बैठक कर देशव्यापी जन आंदोलन खड़ा करने की बात कर रही है। जिन चेहरों के साथ वह आंदोलन चलाना चाहती है, उनकी विश्वसनीयता भी सवालों के घेरे में है। कांग्रेस को सबसे पहले अपने राजनीतिक क्रेडिट स्कोर की जांच करनी चाहिए। मीनाक्षी नटराजन के मामले में जिस प्रकार का रुख कांग्रेस ने अपनाया है, वह एक ओर अनावश्यक राजनीतिक प्रतिक्रिया प्रतीत होता है तो दूसरी ओर अदालत और संवैधानिक संस्थाओं को कटघरे में खड़ा करता है।

कांग्रेस को कोई नहीं हरा रहा है। जो स्वयं से हार रहा हो, उसे हराने के लिए किसी दूसरे की आवश्यकता नहीं होती। कांग्रेस रहे या न रहे, संविधान रहेगा, न्यायालय रहेंगे, चुनाव आयोग रहेगा और यह व्यवस्था भी कायम रहेगी। भारत रूल ऑफ लॉ से ही चलेगा।

सुप्रीम कोर्ट पर सवाल खड़े कर कांग्रेस भले ही रूल ऑफ लॉ के अंत का ऐलान करती दिखाई दे, लेकिन देश जिस संस्था पर विश्वास करता है, उस पर कांग्रेस का अविश्वास ही उसके लगातार घटते राजनीतिक क्रेडिट स्कोर का सबसे बड़ा कारण बनता जा रहा है।

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