नई दिल्ली, 16 जून।
मई महीने में थोक महंगाई दर 9.68% पर पहुंच गई है, जो अप्रैल के 8.26% की तुलना में उल्लेखनीय वृद्धि है। सितंबर 2022 के बाद यह सबसे ऊंचा स्तर है और संकेत देता है कि आम आदमी की थाली से लेकर उद्योगों के कच्चे माल तक हर क्षेत्र पर महंगाई का दबाव बढ़ रहा है। प्राइमरी आर्टिकल्स की महंगाई 3.78% से बढ़कर 4.99% हो गई है, जबकि फूड इंडेक्स 3.11% से बढ़कर 4.49% पर पहुंच गया है। सबसे अधिक वृद्धि फ्यूल और पावर श्रेणी में दर्ज की गई, जहां महंगाई 24.89% से बढ़कर 30.33% हो गई। मैन्युफैक्चरिंग उत्पादों की कीमतों में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
इसका सीधा असर अनाज, सब्जी, खाद्य तेल, डीजल, पेट्रोल, बिजली, सीमेंट और स्टील जैसी आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर दिखाई दे रहा है। थोक महंगाई का प्रभाव कुछ समय बाद खुदरा बाजार पर भी पड़ता है, इसलिए आने वाले दिनों में घरेलू बजट पर अतिरिक्त दबाव पड़ना तय माना जा रहा है।
महंगाई बढ़ने के पीछे कई घरेलू और वैश्विक कारण हैं। अमेरिका-ईरान तनाव के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य में अनिश्चितता बनी हुई है, जिससे कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई है। भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए ईंधन महंगा होने का असर परिवहन लागत और फिर हर वस्तु की कीमत पर पड़ता है।
दूसरी ओर कमजोर मानसून और बेमौसम बारिश से दलहन, तिलहन और सब्जियों की पैदावार प्रभावित हुई है, जिससे आपूर्ति घटने के कारण कीमतें बढ़ी हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध और लाल सागर क्षेत्र में तनाव के चलते वैश्विक सप्लाई चेन भी पूरी तरह सामान्य नहीं हो सकी है। शिपिंग लागत बढ़ने और कंटेनरों की देरी ने आयातित वस्तुओं को महंगा कर दिया है। कोविड के बाद आर्थिक गतिविधियों में तेजी, निर्माण परियोजनाओं और मांग में वृद्धि ने भी कीमतों पर दबाव बनाया है।
महंगाई को नियंत्रित करने के लिए सरकार और रिजर्व बैंक कई स्तरों पर प्रयास कर रहे हैं। रिजर्व बैंक ने रेपो रेट बढ़ाकर बाजार में नकदी नियंत्रित करने का प्रयास किया है। सरकार ने गेहूं और चावल के निर्यात पर नियंत्रण रखा है, प्याज पर निर्यात शुल्क लगाया है और बफर स्टॉक से दाल उपलब्ध कराई जा रही है। एनएएफईडी और एनसीसीएफ के माध्यम से आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता बनाए रखने की कोशिश की जा रही है।
उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों को गैस सब्सिडी और प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत करोड़ों लोगों को मुफ्त राशन उपलब्ध कराया जा रहा है। 'वन नेशन वन राशन कार्ड', ई-नाम, किसान रेल और पीएम-किसान जैसी योजनाओं ने भी सप्लाई चेन को मजबूत करने और किसानों को राहत देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। पिछले वर्षों में दाल और तिलहन उत्पादन बढ़ाने के प्रयासों का भी सकारात्मक प्रभाव दिखाई दिया है।
दीर्घकालिक समाधान के लिए खाद्य तेलों और ऊर्जा क्षेत्र में आयात पर निर्भरता कम करना आवश्यक होगा। इथेनॉल मिश्रण बढ़ाने, इलेक्ट्रिक वाहनों को प्रोत्साहन देने, सौर ऊर्जा के विस्तार, जलवायु अनुकूल खेती, आधुनिक सिंचाई तकनीक और बेहतर भंडारण क्षमता विकसित करने पर विशेष ध्यान देना होगा। उत्पादन बढ़ाने और बर्बादी रोकने के साथ मजबूत लॉजिस्टिक्स नेटवर्क तैयार करना भी समय की मांग है।
वर्तमान स्थिति केवल भारत की चुनौती नहीं, बल्कि वैश्विक परिस्थितियों का परिणाम है। फिर भी मजबूत आर्थिक प्रबंधन, आत्मनिर्भरता और उत्पादन क्षमता में वृद्धि के माध्यम से इसका प्रभाव सीमित किया जा सकता है। महंगाई केवल आर्थिक सूचकांक नहीं, बल्कि हर परिवार की रसोई का गणित है। इस गणित का संतुलन बनाए रखना सरकार, राज्यों, उद्योग और समाज सभी की साझा जिम्मेदारी है, क्योंकि रसोई का बजट बिगड़ता है तो उसका असर पूरे परिवार और अंततः पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।









