भोपाल, 16 जून।
लड़कियां सुरक्षित कब होंगी? यह सवाल हर उस मां-बाप की आंखों में तैरता है जिसकी बेटी शाम 7 बजे के बाद ट्यूशन से घर लौटती है। यह सवाल उस लड़की के मन में भी गूंजता है जो मेट्रो में अकेली खड़ी है और हर स्टेशन पर डरती है कि अगला चेहरा कैसा होगा।
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के 2024 के आंकड़े बताते हैं कि देश में हर दिन औसतन 86 बलात्कार के मामले दर्ज होते हैं। मध्यप्रदेश लगातार चौथे साल 'रेप कैपिटल' की सूची में ऊपर है। 2024 में अकेले मध्यप्रदेश में 3,029 बलात्कार के मामले दर्ज हुए, यानी हर तीन घंटे में एक बेटी की अस्मत तार-तार हुई। ये सिर्फ दर्ज आंकड़े हैं। हकीकत इससे कहीं अधिक डरावनी है, क्योंकि 70 प्रतिशत से ज्यादा मामले लोकलाज के डर से थाने तक पहुंचते ही नहीं।
'बेटी बचाओ, बेटे पढ़ाओ'। लड़कियां उस दिन सुरक्षित होंगी, जिस दिन मां-बाप बेटी के दुपट्टे की लंबाई नहीं, बेटे की सोच की गहराई नापेंगे। जिस दिन स्कूल की प्रार्थना में "अहिंसा परमो धर्म" के साथ "सम्मान परमो धर्म" भी जुड़ जाएगा। जिस दिन खाप पंचायतें लड़की की इज्जत नहीं, लड़के की हरकत पर पंचायत करेंगी। बराबरी का भरोसा भाषण से नहीं, व्यवहार से आएगा। जब बस का ड्राइवर रात 10 बजे अंतिम स्टॉप पर लड़की को अकेला देखकर बस रोकेगा, जब पुलिस एफआईआर लिखने से पहले "समझौता कर लो" नहीं कहेगी, जब जज तारीख नहीं, इंसाफ देगा, तब बदलाव आएगा।
एक सभ्य समाज की पहचान मॉल की ऊंचाई से नहीं, आधी आबादी की निर्भीक हंसी से होती है। बेटियों की आजादी कम मत करो, बेटों का वहशीपन खत्म करो। क्योंकि सुरक्षा का रास्ता लड़की के कपड़ों से नहीं, लड़के के चरित्र से होकर जाता है। जिस दिन यह समझ आ गई, उस दिन कोई मां फोन पर यह नहीं पूछेगी कि "बेटा पहुंच गई?" बल्कि कहेगी, "बेटा, बेफिक्र घूम, यह शहर तेरा भी है।"
सवाल गलत जगह, आजादी गुनहगार नहीं, सोच बीमार है
हर हादसे के बाद बहस शुरू होती है कि लड़की रात में क्यों निकली, कपड़े कैसे थे, सोशल मीडिया पर क्या डालती है। यानी पीड़िता को ही कटघरे में खड़ा कर दो। परंतु एनसीआरबी का डेटा दूसरा सच बताता है। 2024 में दर्ज बलात्कार के 94.7 प्रतिशत मामलों में आरोपी पीड़िता का परिचित था - रिश्तेदार, पड़ोसी, दोस्त या शिक्षक। निर्भया कांड के बाद बने पॉक्सो एक्ट के 60 प्रतिशत मामलों में पीड़िता की उम्र 18 वर्ष से कम थी। पांच साल की बच्ची फ्रॉक में थी या 50 साल की महिला साड़ी में, दरिंदों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।
फिर भी कुछ लोग कहते हैं कि आजादी देने के कारण अपराध बढ़ रहे हैं। सच्चाई इसके उलट है। केरल और हिमाचल प्रदेश में लड़कियों की साक्षरता और कार्यबल में भागीदारी सबसे अधिक है, लेकिन वहां बलात्कार की दर मध्यप्रदेश और राजस्थान की तुलना में लगभग आधी है। यानी आजादी नहीं, पिछड़ी सोच अपराध को जन्म देती है।
समस्या प्लेटफॉर्म नहीं, परवरिश है
बेटे को फोन दे दिया, पर डिजिटल संस्कार नहीं दिए। उसे यह नहीं बताया कि स्क्रीन के उस पार भी एक जीवित इंसान है। पाश्चात्य संस्कृति से जींस नहीं, बल्कि 'कंसेंट' का कॉन्सेप्ट सीखने की जरूरत है। पश्चिमी देशों में 14 वर्ष की उम्र से स्कूलों में गुड टच-बैड टच की शिक्षा अनिवार्य है। हमारे यहां सेक्स एजुकेशन को बेशर्मी माना जाता है। नतीजा यह है कि लड़का "ना" का मतलब नहीं समझता।
कानून है, पर डर नहीं
निर्भया कांड के बाद कानून बदले, पॉक्सो एक्ट, फास्ट ट्रैक कोर्ट और मौत की सजा तक का प्रावधान आया। फिर भी एनसीआरबी 2024 के अनुसार बलात्कार के मामलों में सजा की दर सिर्फ 28.6 प्रतिशत है। यानी 100 में 72 दरिंदे बरी हो जाते हैं। वजह है जांच में देरी, सबूतों से छेड़छाड़ और पीड़िता पर समझौते का दबाव। मध्यप्रदेश में ही 2024 में 400 से ज्यादा बलात्कार मामलों में खाप पंचायतों ने फैसला सुनाकर पुलिस तक मामला पहुंचने ही नहीं दिया।
जब तक सजा त्वरित और निश्चित नहीं होगी, तब तक कानून का डर पैदा नहीं होगा। भरोसा तब आएगा जब 60 दिन में चार्जशीट, छह महीने में फैसला और अपील की अनावश्यक लंबी प्रक्रिया पर प्रभावी नियंत्रण होगा।
बचाव का रास्ता: पांच मोर्चों पर लड़ाई
बेटों का संस्कार: बेटी को सतर्क रहने से पहले बेटे को सभ्य रहना सिखाना होगा। पांच साल के बच्चे को बताइए कि मर्जी के बिना छूना अपराध है। "लड़के रोते नहीं" की जगह "लड़के मारते नहीं" सिखाइए।
स्कूलों की भूमिका: मध्यप्रदेश के हर स्कूल में छठी कक्षा से जेंडर सेंसिटाइजेशन अनिवार्य हो। लड़कों को सिखाया जाए कि मस्क्युलिनिटी का मतलब आक्रामकता नहीं, सम्मान है।
सामाजिक भागीदारी: मोहल्ले में छेड़छाड़ होने पर "मामला घर का है" न कहें। 112 पर कॉल करें। अपराधी का सामाजिक बहिष्कार करें।
सुरक्षा के कड़े इंतजाम: हर बस में पैनिक बटन, सीसीटीवी, जीपीएस हो। हर पंचायत को डार्क स्पॉट मैपिंग के लिए फंड मिले। फास्ट ट्रैक कोर्ट की संख्या बढ़ाई जाए।
स्वास्थ्य और तकनीक: हर जिला अस्पताल में 24×7 सखी सेंटर हो। एमपी ई-कॉप ऐप और डायल-100 के महिला सहायता विकल्प का व्यापक प्रचार हो।
आजादी नहीं, नजरिया बदलो। कुछ लोग कहते हैं कि पहले लड़कियां घर में रहती थीं, इसलिए सुरक्षित थीं। लेकिन आंकड़े यह दावा झुठला देते हैं। एनसीआरबी 2024 के अनुसार 31 प्रतिशत बलात्कार पीड़िताओं के साथ वारदात घर की चारदीवारी के भीतर हुई। दादा, चाचा, भाई और सौतेले पिता तक आरोपी पाए गए। यानी चारदीवारी सुरक्षा नहीं, कई बार जेल साबित होती है।
आजादी अपराध नहीं बढ़ाती। नॉर्वे और आइसलैंड जैसे देशों में लड़कियां रात दो बजे भी अकेले घूमती हैं और वहां बलात्कार की दर भारत की तुलना में बहुत कम है, क्योंकि वहां बेटों को बचपन से ही सम्मान, सहमति और समानता का संस्कार सिखाया जाता है।
-सीमा नागर (सामाजिक कार्यकर्ता)










