संपादकीय
16 Jun, 2026

योजनाएं जनता के लिए, तिजोरियां अफसरों की: जब सेवक ही मालिक बन बैठें तो लोकतंत्र लुटता है

महिला एवं बाल विकास विभाग के संयुक्त संचालक लक्ष्मीनारायण कंडवाल के यहां मिली आय से कई गुना अधिक संपत्ति ने सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन, जवाबदेही और भ्रष्टाचार नियंत्रण व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

इंदौर, 16 जून।

सरकार की हर योजना का मकसद एक ही होता है - जनता का कल्याण। पोषण आहार, सड़क, बिजली, पानी, पेंशन - फाइलों पर मोटे-मोटे अक्षरों में जनहित लिखा जाता है, परंतु जमीन पर जब योजना उतरती है तो जन गायब हो जाता है और सिर्फ हित बचता है - अफसर का, बाबू का और ठेकेदार का।

इंदौर के महिला एवं बाल विकास विभाग के संयुक्त संचालक लक्ष्मीनारायण कंडवाल के बैंक लॉकर से बरामद 25 लाख रुपये नकद और अब तक सामने आई 10.80 करोड़ रुपये की बेनामी संपत्ति इस सड़ांध का ताजा सबूत है। यह कोई पहला मामला नहीं, बल्कि एक पैटर्न है, एक ऐसी बीमारी है जो लोक निर्माण, पंचायत, ऊर्जा, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे हर विभाग को खा रही है।

300 गुना वेतन से अधिक संपत्ति, फिर भी भूख खत्म नहीं

लोकायुक्त की छापेमारी में खुलासा हुआ कि कंडवाल के पास वेतन से लगभग 300 गुना अधिक संपत्ति मिली। स्कीम-103 में चार मंजिला मकान, चार बैंक खाते, धार जिले में जमीनें और बेकल्या क्षेत्र में भारी निवेश मिला। 30 साल की नौकरी में अफसर ने इतना जोड़ लिया कि सात पुश्तें बैठकर खाएं। सवाल है कि यह पैसा आया कहां से?

जवाब सब जानते हैं - पोषण आहार के पैकेट से आटा चोरी करके, आंगनवाड़ी भवनों में सीमेंट की जगह रेत भरकर और विधवा पेंशन के फॉर्म पर अंगूठा लगवाकर। महिला एवं बाल विकास विभाग, जहां कुपोषित बच्चों के लिए चना-दाल भेजी जाती है, वहीं अफसर अपनी तिजोरी में नोटों की दाल भर रहा था।

बीमारी हर विभाग में, सिर्फ नाम बदलते हैं

कंडवाल अकेला नहीं है। कल लोक निर्माण विभाग का इंजीनियर करोड़ों की संपत्ति के साथ पकड़ा गया था, परसों पंचायत सचिव के घर से नोटों के बंडल निकले। ऊर्जा विभाग में ट्रांसफार्मर के नाम पर, स्वास्थ्य विभाग में दवा खरीद के नाम पर और शिक्षा विभाग में यूनिफॉर्म के नाम पर हर जगह कमीशन का मीटर चल रहा है।

योजनाएं दिल्ली और भोपाल में बनती हैं, करोड़ों का बजट पास होता है, परंतु गांव पहुंचते-पहुंचते वह सूखा राशन बन जाता है, क्योंकि रास्ते में हर टेबल पर दस्तूरी रखनी पड़ती है। फाइल तब तक नहीं चलती जब तक उसके पहियों में तेल न डाला जाए। जनता के लिए बनी योजना अफसरों के लिए एटीएम बन गई है। लोकायुक्त पकड़ता है, परंतु तब तक बीमारी कैंसर बन चुकी होती है।

पोस्टमार्टम नहीं, इलाज चाहिए

ईओडब्ल्यू और लोकायुक्त की टीमें छापे मारती हैं, लॉकर खोलती हैं, संपत्ति कुर्क करती हैं। तालियां बजती हैं, अखबारों में सुर्खियां बनती हैं, लेकिन यह इलाज नहीं, पोस्टमार्टम है। मरीज मर चुका होता है, तब डॉक्टर आता है।

जब कंडवाल 30 साल से संपत्ति बना रहा था, तब उसके वरिष्ठ अधिकारी क्या कर रहे थे? विजिलेंस क्या कर रही थी? विभागीय ऑडिट कहां सो रहा था? हर साल एसीआर लिखने वाला आईएएस अधिकारी क्यों नहीं देख पाया कि उसका जूनियर वेतन से 300 गुना अधिक संपत्ति कैसे बना रहा है? क्योंकि ऊपर से नीचे तक हिस्सेदारी का सिस्टम चलता है। छोटा अफसर खाता है और बड़े को हिस्सा देता है। इसलिए कोई किसी को रोकता नहीं। सब भ्रष्टाचार की सहकारी समिति के सदस्य बने बैठे हैं।

संपत्ति का नहीं, सिस्टम की नंगई का खुलासा

10.80 करोड़ रुपये की संपत्ति सिर्फ कंडवाल की हैसियत नहीं बताती, बल्कि सरकारी योजनाओं की असलियत भी बताती है। अगर पोषण आहार का 50 प्रतिशत भी बच्चों तक पहुंच जाता तो मध्यप्रदेश कुपोषण में शीर्ष राज्यों में नहीं होता। अगर मनरेगा का 70 प्रतिशत पैसा मजदूर तक पहुंचता तो पलायन कम होता।

यह पैसा हवा में नहीं बना। यह विधवा की पेंशन से निकला है, आदिवासी की थाली से छीना गया है, स्कूल की छत से टपकता है और अस्पताल में ऑक्सीजन की कमी बनकर सामने आता है। भ्रष्टाचार कोई आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि सामाजिक हत्या है।

रियल टाइम मॉनिटरिंग ही समाधान

हर योजना का पैसा पीएफएमएस के माध्यम से सीधे लाभार्थी के खाते में जाए और बिचौलियों की भूमिका समाप्त हो। आंगनवाड़ी में कितना राशन पहुंचा, इसकी मोबाइल ऐप पर फोटो अपलोड हो। स्कूल में यूनिफॉर्म बंटी तो बच्चों की फोटो पोर्टल पर दर्ज हो। हर अफसर और जनप्रतिनिधि की संपत्ति का ब्यौरा सार्वजनिक हो और लोकायुक्त हर साल उसका आयकर रिटर्न तथा बैंक स्टेटमेंट से मिलान करे। 20 प्रतिशत से अधिक असामान्य वृद्धि मिलने पर तत्काल जांच शुरू हो।

बड़े अफसरों की जवाबदेही भी तय हो। यदि जूनियर अधिकारी भ्रष्टाचार में पकड़ा जाता है तो उसके वरिष्ठ अधिकारी पर भी पर्यवेक्षण में लापरवाही का मामला दर्ज हो। जब तक ऊपर वाले की गर्दन नहीं फंसेगी, तब तक नीचे वाला नहीं डरेगा।

सजा ऐसी हो कि रूह कांप जाए। भ्रष्टाचार साबित होने पर नौकरी से बर्खास्तगी, संपत्ति राजसात और कम से कम 10 साल की सजा हो। अभी सस्पेंशन होता है, फिर बहाली होती है और वही अधिकारी वापस कुर्सी पर बैठ जाता है।

लोकतंत्र लुटेरों से नहीं, चुप्पी से मरता है। सरकार योजनाएं बनाकर अपना काम पूरा मान लेती है, लोकायुक्त छापे मारकर वाहवाही लूट लेता है, परंतु जनता आज भी कंडवाल जैसे अफसरों की तिजोरी भरने के लिए टैक्स दे रही है।

लोकतंत्र में मालिक जनता होती है और अफसर उसका नौकर। जब नौकर ही मालिक की तिजोरी काटने लगे तो समझिए संविधान खतरे में है। अब समय आ गया है कि योजनाएं कागज पर नहीं, जमीन पर उतरें और अफसरों की तिजोरी नहीं, जनता की थाली भरें। वरना लोकतंत्र का लोक भूखा मरेगा और तंत्र लगातार मोटा होता जाएगा।

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