नई दिल्ली, 16 जून।
राफेल डील अब केवल 4.5 पीढ़ी के लड़ाकू विमान की खरीद तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता, रक्षा कूटनीति और वैश्विक हथियार बाजार में बढ़ती हैसियत का प्रतीक बन गई है। यदि भारत 12 संभावित देशों को होने वाली राफेल डील में 60% स्वदेशी हिस्सेदारी की शर्त मनवाने में सफल होता है तो दुनिया यह मानेगी कि भारत अब केवल बाजार नहीं, बल्कि वैश्विक रक्षा उद्योग का भागीदार बन चुका है। वायुसेना को आधुनिक विमान चाहिए, वित्त मंत्रालय को लागत कम रखनी है और युवाओं को रोजगार चाहिए। इन तीनों आवश्यकताओं का समाधान तभी संभव है जब राफेल भारत में बने, भारतीय हथियारों से लैस हो और भारत के माध्यम से दुनिया तक पहुंचे।
फ्रांस की कंपनी डसॉल्ट एविएशन मिस्र, यूएई, इंडोनेशिया, सर्बिया और कतर जैसे देशों को राफेल बेच रही है, जबकि ग्रीस, कोलंबिया, बांग्लादेश समेत 12 नए देश कतार में हैं। भारत का तर्क है कि जब वह 36 राफेल खरीद चुका है और नौसेना के लिए 26 राफेल-एम की लगभग 63 हजार करोड़ रुपये की डील अंतिम चरण में है, तो तीसरे देशों को जाने वाले राफेल में भारत में बने सिस्टम लगाने का अधिकार भी उसे मिलना चाहिए। इससे भारतीय कंपनियों को वैश्विक सप्लाई चेन में स्थान मिलेगा, स्पेयर पार्ट्स देश में बनने से लागत घटेगी और भारत रक्षा निर्यात का बड़ा केंद्र बन सकेगा।
हालांकि फ्रांस के लिए यह शर्त आसान नहीं है। डसॉल्ट राफेल को अपनी तकनीकी श्रेष्ठता का प्रतीक मानती है। रडार, एवियोनिक्स, मिशन कंप्यूटर और इंजन का बड़ा हिस्सा फ्रांस में तैयार होता है। भारत चाहता है कि अस्त्र मिसाइल, रुद्रम एंटी-रेडिएशन मिसाइल, उत्तम एईएसए रडार, स्वदेशी इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सूट और भविष्य में ब्रह्मोस-एनजी जैसे सिस्टम भी तीसरे देशों को निर्यात होने वाले राफेल में जोड़े जा सकें। फ्रांस को आशंका है कि अधिक स्वदेशी हिस्सेदारी से उसकी तकनीकी पहचान कमजोर होगी और संवेदनशील तकनीक के लीक होने का खतरा बढ़ेगा।
भारतीय वायुसेना की 114 मल्टी-रोल फाइटर एयरक्राफ्ट की आवश्यकता इस पूरी बहस की असली परीक्षा है। सरकार चाहती है कि इनमें से अधिकांश विमान भारत में बनें और उनमें 60% स्वदेशी सामग्री हो। इसके लिए भारत में असेंबली लाइन स्थापित करनी होगी तथा इंजन प्रौद्योगिकी हस्तांतरण पर सहमति बनानी होगी। बिना इंजन तकनीक के आत्मनिर्भरता अधूरी रहेगी और भविष्य की एएमसीए परियोजना भी प्रभावित होगी।
भारत अब केवल विमान नहीं, बल्कि प्लेटफॉर्म की स्वतंत्रता चाहता है। अभी विदेशी हथियार प्रणालियों में दूसरे देशों के हथियार जोड़ने में अनेक प्रतिबंध आते हैं। यूक्रेन युद्ध ने यह भी दिखाया कि यदि युद्ध के दौरान स्पेयर पार्ट्स रुक जाएं तो पूरी फ्लीट प्रभावित हो सकती है। इसलिए भारत मिशन कंप्यूटर के सोर्स कोड और ओपन आर्किटेक्चर की मांग कर रहा है ताकि भविष्य में अपनी आवश्यकता के अनुसार हथियार एकीकृत किए जा सकें।
इस राह में कीमत, समय और कूटनीतिक संतुलन जैसी चुनौतियां भी हैं। नई उत्पादन लाइन स्थापित करने और बड़े पैमाने पर स्वदेशीकरण में वर्षों लग सकते हैं, जबकि वायुसेना के स्क्वाड्रनों की संख्या पहले ही आवश्यकता से कम है। अमेरिका और रूस भी अपने विकल्पों के साथ मैदान में हैं, इसलिए भारत को रणनीतिक संतुलन बनाए रखना होगा।
राफेल डील अब केवल रक्षा खरीद नहीं, बल्कि औद्योगिक विकास, तकनीकी आत्मनिर्भरता और रोजगार सृजन का अवसर है। जिस दिन किसी मित्र देश की वायुसेना का राफेल भारत में बने हथियारों के साथ उड़ान भरेगा और उस पर "मेड इन इंडिया" की छाप होगी, उसी दिन आत्मनिर्भर भारत की वास्तविक उड़ान मानी जाएगी। तब तक सरकार की जिम्मेदारी है कि वह स्पष्ट करे कि 60% स्वदेशी की गारंटी केवल कागज पर है या भविष्य के करारों का हिस्सा बनने जा रही है।










