तिरुवनंतपुरम, 16 जून।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष में तिरुवनंतपुरम में आयोजित कार्यक्रम में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत के वक्तव्य ने दक्षिण एशिया की राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है। उन्होंने कहा, "हम हिटलर नहीं हैं, पाकिस्तान से बातचीत के रास्ते खुलेंगे।" इस एक वाक्य ने भारत-पाक वार्ता की संभावनाओं को लेकर नई उम्मीद जगा दी है। संघ का यह बयान सरकार के लिए माहौल तैयार करने जैसा माना जा रहा है। सरकार यदि सीधे पहल करे तो राजनीतिक जोखिम हो सकता है, जबकि संघ के माध्यम से जनमानस को संवाद के लिए तैयार किया जा सकता है।
हालांकि इस राह में चुनौतियां कम नहीं हैं। सबसे बड़ी बाधा पाकिस्तान की सेना है, जहां वास्तविक शक्ति रावलपिंडी के हाथों में मानी जाती है और भारत-विरोध उसकी रणनीति का अहम हिस्सा रहा है। दूसरी चुनौती आतंकवाद है। मुंबई से लेकर पुलवामा तक के घाव अभी भी ताजा हैं और आतंक पर ठोस कार्रवाई के बिना किसी भी वार्ता को जनसमर्थन मिलना कठिन होगा। तीसरी चुनौती घरेलू राजनीति है, जहां विपक्ष इसे नीति परिवर्तन बताकर सवाल उठा सकता है।
डॉ. भागवत ने यह भी कहा कि आज भी पाकिस्तान में एक बड़ा वर्ग विभाजन को गलत मानता है और 'टू-नेशन थ्योरी' से सहमत नहीं है। उनके अनुसार भविष्य में दोनों देशों को साथ लाना हो या शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का वातावरण बनाना हो, संवाद के रास्ते खुले रहने चाहिए। यह संदेश बताता है कि बंदूक के बजाय बातचीत को प्राथमिकता दी जानी चाहिए और पाकिस्तान में भारत-विरोध के अलावा भी सकारात्मक सोच रखने वाला वर्ग मौजूद है।
पिछले एक दशक से भारत-पाक संबंध लगभग ठप हैं। वर्ष 2019 के बाद औपचारिक वार्ता, व्यापार, क्रिकेट और सांस्कृतिक आदान-प्रदान लगभग बंद हैं। ऐसे में संघ प्रमुख का बयान 'ट्रैक-टू कूटनीति' की दिशा में संकेत माना जा सकता है। पाकिस्तान की आर्थिक बदहाली, चीन के कर्ज के दबाव और भारत की बढ़ती वैश्विक प्रतिष्ठा ने वहां के एक वर्ग को रिश्ते सामान्य करने की जरूरत का एहसास कराया है।
हाल के समय में शंघाई सहयोग संगठन के मंच पर अनौपचारिक बातचीत, करतारपुर कॉरिडोर का संचालन और सीमित व्यापार की चर्चाएं भी संकेत देती हैं कि संवाद की संभावना पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। दवा, कृषि उत्पाद, धार्मिक पर्यटन, मेडिकल वीजा और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में सहयोग विश्वास बहाली का माध्यम बन सकते हैं। लेकिन भारत की शर्त स्पष्ट रहनी चाहिए कि आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते।
विभाजन की पीड़ा तीन पीढ़ियां झेल चुकी हैं। नफरत किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं बन सकती। संघ प्रमुख के बयान ने वार्ता की संभावना जरूर जगाई है, लेकिन इसे वास्तविकता में बदलने की जिम्मेदारी दोनों देशों की है। भारत ने संवाद की खिड़की खुली रखी है, अब पाकिस्तान को तय करना है कि वह अतीत की राजनीति में उलझा रहेगा या भविष्य की ओर कदम बढ़ाएगा।









