नई दिल्ली, 16 जून।
अमेरिका-ईरान संघर्ष की आग अब केवल पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसका असर भारत के अस्पतालों तक पहुंच गया है। कैंसर जैसी गंभीर बीमारी का इलाज और कठिन होता जा रहा है तथा जीवनरक्षक दवाओं की उपलब्धता प्रभावित होने लगी है। नवोदय कैंसर मेडिकल ऑन्कोलॉजी विभाग के चेयरपर्सन डॉ. श्याम अग्रवाल के अनुसार कैंसर उपचार में उपयोग होने वाली दो महत्वपूर्ण दवाओं 'सिस्प्लैटिन' और 'कार्बोप्लैटिन' की पिछले दो-तीन सप्ताह से भारी कमी बनी हुई है। फेफड़ों, मुंह, गर्भाशय और ब्लड कैंसर समेत कई प्रकार के कैंसर के इलाज में इनका उपयोग होता है और इनकी कमी से बड़ी संख्या में मरीज प्रभावित हो सकते हैं।
इस संकट का प्रमुख कारण वैश्विक सप्लाई चेन का प्रभावित होना है। होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के कारण दवा निर्माण के लिए आवश्यक कच्चे माल की आपूर्ति बाधित हुई है। भारत अपनी बड़ी मात्रा में 'एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स' का आयात करता है, जिससे कंटेनरों की देरी और परिवहन लागत में भारी वृद्धि हुई है। वहीं कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने दवा निर्माण में प्रयुक्त सॉल्वेंट, प्लास्टिक और पैकेजिंग सामग्री को भी महंगा कर दिया है।
सिस्प्लैटिन और कार्बोप्लैटिन जैसी जेनेरिक दवाएं आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों के लिए सहारा थीं। अब उनकी कमी के कारण महंगे विकल्प अपनाने पड़ रहे हैं और कई मामलों में इलाज टालना पड़ रहा है। समय पर कीमोथेरेपी न मिलने से बीमारी गंभीर अवस्था में पहुंच सकती है। इसलिए आवश्यक है कि सरकार वैकल्पिक सप्लाई रूट विकसित करे, घरेलू एपीआई (API) उत्पादन को गति दे और जीवनरक्षक दवाओं की निर्बाध उपलब्धता सुनिश्चित करे। क्योंकि पेट्रोल महंगा होने से गाड़ी रुकती है, लेकिन दवा महंगी होने से जिंदगी रुक जाती है।









