नई दिल्ली, 16 जून।
सीमा केवल नक्शे पर खींची गई एक रेखा नहीं होती। वह वह स्थान है, जहां देश का कानून, संस्कृति और नागरिक सबसे पहले खड़े होते हैं। यदि पहली चौकी ही कमजोर पड़ जाए तो राजधानी कितनी भी मजबूत क्यों न हो, उसकी नींव कमजोर ही मानी जाएगी। केंद्रीय गृह मंत्री द्वारा सीमावर्ती जिलों और महानगरों में जनसांख्यिकीय बदलावों के अध्ययन के लिए उच्चस्तरीय समिति के गठन का निर्देश इसी दृष्टि से महत्वपूर्ण है। समिति का उद्देश्य अवैध प्रवासन और अन्य अस्वाभाविक कारणों से हो रहे जनसंख्या परिवर्तनों का आकलन कर चुनौतियों से निपटने के उपाय सुझाना है।
यह पहल देर से सही, लेकिन आवश्यक है। भारत की 15,106 किमी लंबी भूमि सीमा सात देशों से लगती है। बांग्लादेश, म्यांमार, नेपाल, पाकिस्तान और चीन से लगे जिले लंबे समय से अवैध घुसपैठ, तस्करी और मानव तस्करी जैसी गतिविधियों के प्रति संवेदनशील रहे हैं। जब सीमा क्षेत्रों की आबादी का स्वरूप तेजी से बदलता है तो यह केवल समाजशास्त्र का विषय नहीं रह जाता, बल्कि आंतरिक सुरक्षा, संसाधनों पर दबाव और सामाजिक संतुलन से भी जुड़ जाता है।
समस्या नई नहीं है, बल्कि अब तक इच्छाशक्ति की कमी रही है। असम, पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, त्रिपुरा, मेघालय और जम्मू-कश्मीर के कई सीमावर्ती क्षेत्रों में जनसंख्या वृद्धि दर लंबे समय से राष्ट्रीय औसत से अधिक रही है। पहचान पत्रों में फर्जीवाड़ा, जमीन की खरीद-फरोख्त और वोट बैंक की राजनीति ने हालात को और जटिल बनाया है। राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से भी यह चिंता का विषय है, क्योंकि अवैध प्रवासियों की आड़ में राष्ट्रविरोधी तत्वों, नकली नोट, हथियार और मादक पदार्थों के नेटवर्क के पनपने की आशंका बढ़ जाती है।
समिति का अध्ययन केवल घुसपैठ तक सीमित नहीं रहना चाहिए। [Identity Document Redacted], मतदाता सूची, राशन कार्ड और जन्म-मृत्यु पंजीकरण के आंकड़ों का सत्यापन कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए। यह भी जांचना आवश्यक है कि बदलाव का कारण अवैध प्रवासन है या रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए होने वाला आंतरिक पलायन। अध्ययन राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक दृष्टिकोण से होना चाहिए।
समाधान भी व्यावहारिक होने चाहिए। सीमा पर स्मार्ट फेंसिंग, बायोमेट्रिक पंजीकरण और तकनीकी निगरानी को मजबूत करने के साथ सीमावर्ती गांवों में रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार जरूरी है। खाली होते गांव सुरक्षा की दृष्टि से सबसे बड़ी कमजोरी बन सकते हैं। इस विषय को सांप्रदायिक या राजनीतिक चश्मे से देखने के बजाय राष्ट्रीय हित के नजरिए से समझने की आवश्यकता है। तथ्य आधारित रिपोर्ट और दीर्घकालिक नीति ही इस चुनौती का स्थायी समाधान दे सकती है।









