राजधानी से लगे एक जिले के साहब इन दिनों सबकी आंखों की किरकिरी बने हुए हैं। शिकायतों की फाइलें ऊपर तक जाती हैं, लेकिन लौटते समय और भी हल्की होकर वापस आ जाती हैं।
वजह पूछने पर अनुभवी लोग बस मुस्कुरा देते हैं और पुरानी कहावत दोहरा देते हैं— "सैंया भये कोतवाल तो डर काहे का।" बाकी सब समझदार हैं, इशारा काफी है।










