विपक्ष मुद्दे तलाश रहा था, लेकिन अपने ही साहबों ने ऐसा माहौल बना दिया कि विरोध की धार अपने आप कुंद पड़ गई। पहले एक बयान ने आंदोलन की हवा निकाल दी, अब दूसरे बयान ने ईमानदारी का ऐसा प्रमाणपत्र बांट दिया कि कार्यकर्ता ही असमंजस में पड़ गए।
अब पार्टी के गलियारों में चर्चा है कि विरोधियों से लड़ाई बाद में होगी, पहले अपनों के बयानों पर ही पहरा लगाना पड़ेगा। आखिर राजनीति में कई बार एक बयान, सौ रणनीतियों पर भारी पड़ जाता है।



















