संपादकीय
06 Jul, 2026

मिश्रित भू-उपयोग नीति: विकास का रास्ता या कॉलोनियों की शांति पर संकट?

प्रदेश की नई मिश्रित भू-उपयोग नीति छोटे कारोबार और शहरी विकास के अवसरों के साथ आवासीय क्षेत्रों की व्यवस्था और शांति को लेकर भी कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े कर रही है।

भोपाल, 6 जुलाई।

कभी सरकार रहवासी इलाकों में व्यावसायिक गतिविधियां संचालित करने पर कड़ी कार्रवाई करते हुए नगर निगमों को सख्ती के निर्देश देती थी, और अब वही सरकार मिश्रित भू-उपयोग (मिक्स्ड लैंड यूज) का नया फॉर्मूला लेकर आई है। इसके तहत जहां प्रतिबंध नहीं है, वहां लगभग सभी प्रकार की गतिविधियों की अनुमति देने की तैयारी है। प्रदेश में लागू की जा रही इस नई शहरी नीति के अनुसार प्रत्येक प्रकार के भूमि उपयोग में सीमित रूप से अन्य उपयोगों की भी अनुमति होगी। केवल वे गतिविधियां प्रतिबंधित रहेंगी, जिन्हें भूमि उपयोग के अनुसार स्पष्ट रूप से निषिद्ध किया गया है। यानी भूमि और भवनों का मिश्रित उपयोग संभव होगा, चाहे वह अस्पताल हो, कार्यालय हो या अन्य स्वीकृत गतिविधि। हालांकि आवासीय क्षेत्रों में खतरनाक उद्योग, भारी विनिर्माण इकाइयां, बड़े गोदाम, प्रदूषणकारी उद्योग, बूचड़खाने, कबाड़खाने, संक्रामक रोग अस्पताल, शोक-व्यवसाय, सुअर पालन, दुग्ध उत्पादन, मुर्गी पालन तथा बड़े परिवहन टर्मिनल जैसी गतिविधियां प्रतिबंधित रहेंगी।

शहरों का चरित्र तेजी से बदल रहा है। काम और घर की दूरी बढ़ रही है, ट्रैफिक जाम और प्रदूषण लगातार बढ़ रहे हैं। छोटे उद्यमियों के लिए दुकान या कार्यालय का महंगा किराया वहन करना आसान नहीं है। सरकार का तर्क है कि यदि लोगों को घर से ही छोटे स्तर पर व्यवसाय करने की सुविधा मिले तो स्वरोजगार को बढ़ावा मिलेगा, महिला उद्यमिता मजबूत होगी, स्टार्टअप की शुरुआती लागत घटेगी और शहरों में आर्थिक गतिविधियां बढ़ेंगी। विकसित देशों में मिश्रित भू-उपयोग सामान्य व्यवस्था है, जहां एक ही इमारत में नीचे दुकान, बीच में कार्यालय और ऊपर आवास होता है। इससे संसाधनों का बेहतर उपयोग होता है और शहरी जीवन अधिक सक्रिय बनता है।

सिद्धांत रूप में यह नीति छोटे कारोबार के लिए उपयोगी साबित हो सकती है। एक ग्राफिक डिजाइनर अपने फ्लैट से काम कर सकता है, बुटीक संचालित करने वाली महिला घर के एक हिस्से को शोरूम बना सकती है और ट्यूशन शिक्षक अलग से कमरा किराए पर लेने के बजाय घर से ही कक्षाएं संचालित कर सकता है। इससे लागत घटेगी, समय बचेगा और परिवार तथा काम के बीच बेहतर संतुलन बन सकेगा। कोरोना काल के बाद वर्क फ्रॉम होम की संस्कृति ने पहले ही घर और कार्यालय के बीच की दूरी कम कर दी है। यह नीति उसी बदलाव को कानूनी मान्यता देने का प्रयास है।

दूसरी ओर, शहरों में किफायती कार्यस्थलों की कमी भी एक बड़ी समस्या है। स्टार्टअप और छोटे उद्यमों के लिए कार्यालय लेना महंगा पड़ता है। यदि घर का एक हिस्सा विधिवत कार्यालय के रूप में पंजीकृत हो जाए तो बैंक ऋण, जीएसटी पंजीयन और सरकारी योजनाओं का लाभ लेना आसान होगा। इससे औपचारिक अर्थव्यवस्था का विस्तार होगा और कर संग्रह भी बढ़ेगा।

लेकिन इस नीति का दूसरा पक्ष भी कम चिंताजनक नहीं है। यदि आवासीय कॉलोनियों में हर दूसरा घर दुकान या कार्यालय बन गया तो दिनभर वाहनों की आवाजाही बढ़ेगी, पार्किंग की समस्या खड़ी होगी, लोडिंग-अनलोडिंग होगी और शोर-शराबे से वरिष्ठ नागरिकों, बच्चों तथा परिवारों की शांति भंग होगी। आवासीय क्षेत्रों की सड़क, पानी, सीवेज और बिजली जैसी मूलभूत सुविधाएं घरों की आवश्यकता के अनुसार विकसित की जाती हैं। व्यावसायिक गतिविधियां बढ़ने पर इन पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा और पूरी व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।

एक और चिंता यह है कि प्रतिबंधित गतिविधियों की सीमा कौन तय करेगा। कौन-सा कारोबार सामान्य है और कौन-सा प्रदूषणकारी या खतरनाक, इसका निर्णय स्थानीय निकायों के अधिकारियों पर निर्भर होगा। ऐसे में मनमानी और भ्रष्टाचार की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। इंस्पेक्टर राज को फिर से बढ़ावा मिलने का खतरा रहेगा। इसके साथ ही एक ही भवन या कॉलोनी में रहने वालों के बीच विवाद भी बढ़ सकते हैं। ऊपर रहने वालों को नीचे की दुकान से शोर की शिकायत होगी, जबकि दुकानदार ग्राहकों की पार्किंग को लेकर पड़ोसियों से उलझेंगे। इससे सामाजिक तनाव बढ़ने की आशंका रहेगी।

मिश्रित भू-उपयोग तभी सफल हो सकता है, जब उसके नियम स्पष्ट और उनका पालन कठोरता से हो। सबसे पहले यह तय होना चाहिए कि किसी भवन के कुल निर्मित क्षेत्र का अधिकतम कितना हिस्सा व्यावसायिक उपयोग में लाया जा सकेगा। ग्राहकों के आने-जाने का समय भी निर्धारित होना चाहिए। पार्किंग की व्यवस्था भवन परिसर के भीतर अनिवार्य हो और प्रदूषण, ध्वनि, दुर्गंध तथा कचरा प्रबंधन के मामलों में शून्य सहिष्णुता की नीति अपनाई जाए। नगर निगमों को तकनीक का सहारा लेते हुए जियो-टैगिंग, ऑनलाइन शिकायत प्रणाली, सीसीटीवी और डिजिटल निगरानी व्यवस्था विकसित करनी होगी। साथ ही आवासीय और व्यावसायिक उपयोग के अनुसार संपत्ति कर की दरें भी स्पष्ट रूप से अलग होनी चाहिए।

केवल सरकार को दोष देकर समाधान नहीं निकलेगा। रहवासी कल्याण संघों (आरडब्ल्यूए) को भी सक्रिय भूमिका निभानी होगी। सोसायटी के उपनियमों में स्पष्ट होना चाहिए कि किस प्रकार की गतिविधियों की अनुमति होगी और किनकी नहीं। घर से व्यवसाय करने वालों को भी यह समझना होगा कि उनकी सुविधा किसी दूसरे की शांति और अधिकारों की कीमत पर नहीं हो सकती।

मिश्रित भू-उपयोग की यह नीति दोधारी तलवार है। यदि इसे संतुलित, पारदर्शी और सख्त नियमों के साथ लागू किया गया तो यह छोटे कारोबार, महिला उद्यमिता और स्टार्टअप संस्कृति को नई उड़ान दे सकती है। लेकिन यदि निगरानी कमजोर रही और नियमों के पालन में ढिलाई बरती गई तो आवासीय कॉलोनियां बाजारों में बदल जाएंगी, विवाद बढ़ेंगे और शहरी जीवन की शांति प्रभावित होगी। इसलिए इस नीति की सफलता संतुलन, पारदर्शिता और जवाबदेही पर निर्भर करेगी। आने वाला समय बताएगा कि यह व्यवस्था विकास का नया अध्याय लिखती है या फिर शहरों के शांत आवासीय जीवन के लिए नई चुनौती बन जाती है।

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