भोपाल, 6 जुलाई।
मध्य प्रदेश में समर्थन मूल्य पर गेहूं उपार्जन का काम मई में ही बंद हो चुका है, लेकिन उसके बाद शुरू हुए सरकारी रिकॉर्ड और गोदामों के मिलान ने विभाग की नींद उड़ा दी है। पूरे प्रदेश के सरकारी रिकॉर्ड में 86 हजार क्विंटल गेहूं का अंतर सामने आया है। यह गेहूं आखिर गोदामों तक क्यों नहीं पहुंचा, इसका जवाब फिलहाल किसी के पास नहीं है। इस गंभीर विसंगति के सामने आने के बाद खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग ने प्रदेश के सभी जिला आपूर्ति अधिकारियों से तत्काल रिपोर्ट और शॉर्टेज के कारण पूछे हैं। इस कमी का सबसे बड़ा खामियाजा किसानों को भुगतना पड़ रहा है, क्योंकि जब तक गोदामों में गेहूं का मिलान पूरा नहीं होगा, तब तक कई किसानों का भुगतान अटका रहेगा।
जांच में सामने आया है कि सागर और जबलपुर संभाग के जिलों में सबसे अधिक गड़बड़ी मिली है। ग्वालियर जिले में भी 250 क्विंटल का अंतर दर्ज किया गया है। खाद्य विभाग ने सभी जिलों से पूछा है कि उपार्जन केंद्रों से तौलकर उठाया गया गेहूं आखिर गोदामों तक क्यों नहीं पहुंचा। अधिकारियों के अनुसार ग्वालियर जिले में सालाना 27 लाख क्विंटल से अधिक गेहूं का उत्पादन होता है। किसान अपनी जरूरत, बीज, पशुओं के चारे और आपातकालीन उपयोग के लिए कुछ हिस्सा अपने पास रखता है, जबकि शेष स्टॉक बाजार या समर्थन मूल्य पर उपार्जन के लिए लाता है। इस बार उपार्जन समाप्त होने के बाद हुए भौतिक सत्यापन में रिकॉर्ड और गोदामों में उपलब्ध गेहूं के बीच 86 हजार क्विंटल का अंतर मिला। यह अंतर केवल एक-दो जिलों तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे प्रदेश में फैला हुआ है। इससे स्पष्ट है कि यह सामान्य लापरवाही नहीं, बल्कि सुनियोजित गड़बड़ी का संकेत है।
सवाल यह है कि उपार्जन केंद्रों से ट्रकों में लदकर निकला गेहूं रास्ते में कहां गायब हो गया। इसकी तीन संभावनाएं सबसे अधिक चर्चा में हैं। पहली, परिवहन के दौरान गेहूं की हेराफेरी कर उसे खुले बाजार में बेच दिया गया। दूसरी, गोदामों में पहुंचने के बाद कागजों में पूरी मात्रा दर्ज कर ली गई, लेकिन वास्तविक तौल कम हुई और अंतर का गेहूं बाजार में खपा दिया गया। तीसरी, फर्जी किसानों के नाम पर केवल कागजों में खरीदी दिखाकर भुगतान उठा लिया गया, जबकि गेहूं कभी गोदाम तक पहुंचा ही नहीं।
इस फर्जीवाड़े का सबसे बड़ा नुकसान उन किसानों को हो रहा है जिन्होंने अपना गेहूं समर्थन मूल्य पर बेचा था। नियम है कि जब तक उपार्जन केंद्र से गोदाम तक पूरे स्टॉक का मिलान नहीं हो जाता, तब तक अंतिम भुगतान जारी नहीं किया जाता। अब 86 हजार क्विंटल का अंतर मिलने से हजारों किसानों का भुगतान अटक गया है। कई किसानों को शादी, बीमारी और अगली फसल की तैयारी के लिए तत्काल पैसों की जरूरत है, लेकिन वे बैंक और समितियों के चक्कर काटने को मजबूर हैं।
खाद्य विभाग के अधिकारी भी मानते हैं कि हर साल उपार्जन के बाद कुछ न कुछ शॉर्टेज सामने आती है, लेकिन इस बार का आंकड़ा असामान्य रूप से बड़ा है। 86 हजार क्विंटल यानी 8,600 टन गेहूं का अंतर सामान्य चूक नहीं हो सकता। इसके पीछे किसी बड़े गिरोह की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता, जिसमें समिति प्रबंधक, परिवहन ठेकेदार, गोदाम प्रभारी और संबंधित अधिकारी तक शामिल हो सकते हैं। बिना अंदरूनी मिलीभगत के इतनी बड़ी गड़बड़ी संभव नहीं है।
विभाग ने सभी जिलों से रिपोर्ट तो मांग ली है, लेकिन हर साल की तरह केवल औपचारिकता निभाकर मामला ठंडे बस्ते में डाल देना समाधान नहीं है। अक्सर छोटे कर्मचारियों पर कार्रवाई कर दी जाती है, जबकि बड़े अधिकारी और प्रभावशाली ठेकेदार बच निकलते हैं। यदि इस बार भी स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच नहीं हुई तो सच्चाई सामने आना मुश्किल होगा।
राज्य की उपार्जन नीति के अनुसार उपार्जन केंद्र से गोदाम तक गेहूं की ढुलाई जीपीएस लगे वाहनों से होनी चाहिए। प्रत्येक ट्रक की तौल धर्मकांटे पर हो, उसकी पर्ची पोर्टल पर अपलोड की जाए और गोदाम पहुंचने पर दोबारा तौल कर मिलान किया जाए। यदि 0.5 प्रतिशत से अधिक अंतर मिले तो एफआईआर और वसूली का प्रावधान है। दुर्भाग्य से व्यवहार में न जीपीएस की प्रभावी निगरानी होती है, न धर्मकांटों की व्यवस्था पूरी तरह लागू है और न ही दोषियों से वसूली होती है।
जरूरत इस बात की है कि मामले की जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी से कराई जाए, उपार्जन प्रक्रिया में तकनीकी निगरानी मजबूत की जाए, किसानों को एसएमएस के माध्यम से उनके गेहूं की आवाजाही की जानकारी दी जाए और दोषियों पर केवल विभागीय कार्रवाई नहीं, बल्कि आपराधिक प्रकरण दर्ज कर सख्त दंड दिया जाए। 86 हजार क्विंटल गेहूं की कीमत लगभग 18 करोड़ रुपये है। यह सरकारी धन ही नहीं, जनता की मेहनत की कमाई है। यदि इसकी जवाबदेही तय नहीं हुई तो नुकसान अंततः आम करदाता और किसान दोनों को उठाना पड़ेगा।
सरकारी कागजों और गोदामों के बीच 86 हजार क्विंटल का यह अंतर केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार की गंभीर गवाही है। यदि इस बार भी कार्रवाई केवल नोटिस और जांच समितियों तक सीमित रही तो आने वाले वर्षों में ऐसे घोटाले और बड़े रूप में सामने आएंगे। इसलिए समय की मांग है कि उपार्जन व्यवस्था को पारदर्शी बनाया जाए और इसे घोटालों का जरिया बनने से रोका जाए।



















