संपादकीय
06 Jul, 2026

नियम कागजों में और जहरीला धुआं सड़कों पर: जहरीले कचरे पर नौकरशाही की चुप्पी और एनजीटी की अनदेखी

भोपाल में जैव-चिकित्सा कचरे के खुले में निस्तारण को लेकर नियमों के पालन, निगरानी व्यवस्था और जिम्मेदार एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

भोपाल, 6 जुलाई।

भोपाल की सड़कों पर जब सुबह लोग सैर के लिए निकलते हैं तो काले धुएं का गुबार उनकी सांसों में जहर घोल देता है। यह धुआं किसी फैक्ट्री का नहीं, बल्कि उन अस्पतालों के जैव-चिकित्सा कचरे का है, जिसे इंसीनेटर में जलाया जाना चाहिए था, लेकिन खर्च बचाने की लापरवाही ने उसे खुले में स्वाहा कर दिया। तस्वीरें गवाही दे रही हैं कि राजधानी के बाहरी इलाकों में रात के अंधेरे में ट्रकों से कचरा लाकर जलाया जा रहा है और दिन ढलते ही राख के ढेर हवा में उड़कर लोगों के फेफड़ों तक पहुंच रहे हैं।

नियम साफ कहते हैं कि अस्पतालों से निकलने वाली पट्टियां, सिरिंज, ग्लव्स, प्लेसेंटा और अंगों के अवशेष जैसे जैव-चिकित्सा कचरे को केवल अधिकृत इंसीनेटर में 850 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान पर जलाया जाए, ताकि डाइऑक्सिन और फ्यूरान जैसी जहरीली गैसें न बनें। बायोमेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स, 2016 में यह भी प्रावधान है कि हर अस्पताल कचरे को रंगीन थैलियों में अलग करेगा, बारकोड लगाएगा और अधिकृत एजेंसी को सौंपेगा। इसके बाद जीपीएस लगे वाहनों से कचरा इंसीनेटर तक पहुंचाया जाएगा। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि भोपाल में कई निजी अस्पताल और छोटे नर्सिंग होम इस प्रक्रिया से बच रहे हैं। कारण साफ है। इंसीनेटर में एक किलो कचरा जलाने का खर्च 20 से 25 रुपये आता है और छोटे अस्पतालों से रोज 10 से 15 किलो कचरा निकलता है। महीने का बिल हजारों रुपये तक पहुंच जाता है। इस खर्च से बचने के लिए कुछ संचालक रात में ठेकेदारों को कचरा सौंप देते हैं, जो उसे शहर के बाहर खुले में जला देते हैं। इससे अस्पतालों का खर्च बच जाता है और ठेकेदार को भी मेहनताना मिल जाता है।

प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारी और नगर निगम के अफसर इस खुले खेल को देखकर भी चुप क्यों हैं? बायोमेडिकल वेस्ट की निगरानी के लिए जिला स्तरीय समिति बनी है, जिसमें कलेक्टर, सीएमएचओ और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारी शामिल हैं। लेकिन समिति की बैठकें कागजों तक ही सीमित हैं। निरीक्षण के नाम पर चुनिंदा बड़े अस्पतालों में खानापूर्ति होती है, जबकि छोटे नर्सिंग होम बिना जांच के संचालित हो रहे हैं।

एनजीटी पहले भी कई बार राज्यों को फटकार लगा चुका है कि जैव-चिकित्सा कचरे का सही निपटान न होने पर जुर्माना लगाया जाए और अस्पताल का लाइसेंस रद्द किया जाए। लेकिन भोपाल में आज तक किसी बड़े निजी अस्पताल पर कड़ी कार्रवाई की खबर सामने नहीं आई। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने कुछ जगहों पर सैंपल लिए, नोटिस दिए, लेकिन मामला चेतावनी से आगे नहीं बढ़ा। नतीजा यह है कि संचालकों के हौसले बुलंद हैं और वे मान चुके हैं कि 'सेटिंग' से सब कुछ मैनेज हो जाएगा।

खुले में जलते इस कचरे से सबसे ज्यादा खतरा सफाई कर्मियों और आसपास रहने वाले गरीब परिवारों को है। जैव-चिकित्सा कचरे में हेपेटाइटिस-बी, एचआईवी और टीबी जैसे रोगों के जीवाणु हो सकते हैं। आग से ये पूरी तरह नष्ट नहीं होते और राख के साथ हवा, पानी और मिट्टी में फैल सकते हैं। धुएं में मौजूद डाइऑक्सिन कैंसर का कारण बन सकता है। बच्चों में जन्मजात विकृतियों और गर्भवती महिलाओं में गर्भपात का खतरा भी बढ़ सकता है। डॉक्टरों का कहना है कि भोपाल के कई इलाकों में सांस की बीमारियां, त्वचा संक्रमण और आंखों में जलन के मरीज बढ़े हैं, लेकिन इनका सीधा संबंध कचरे के धुएं से जोड़ना कठिन है, क्योंकि इस विषय पर कोई व्यापक अध्ययन नहीं हुआ है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पास न पर्याप्त स्टाफ है और न ही ऐसी प्रयोगशाला सुविधा कि वह राख और धुएं के नमूनों की नियमित जांच कर सके। इसी का फायदा लापरवाह अस्पताल उठा रहे हैं।

कचरा प्रबंधन शुल्क के नाम पर हर अस्पताल से नगर निगम मोटी रकम वसूलता है, लेकिन उस राशि से इंसीनेटर की प्रभावी निगरानी नहीं होती। कागजों में दिखाया जाता है कि पूरा कचरा अधिकृत प्लांट तक पहुंच रहा है, जबकि सड़क पर जलती आग सच्चाई बयान कर रही है। ठेकेदार रात में कचरा उठाते हैं और सुबह निगम को औपचारिक रजिस्टर थमा देते हैं। जीपीएस वाले वाहन या तो खराब पड़े रहते हैं या उनके रूट बदल दिए जाते हैं। नौकरशाही की मेहरबानी का आलम यह है कि कई अस्पतालों के पास इंसीनेटर का अनुबंध तक नहीं है, फिर भी उनका लाइसेंस हर साल नवीनीकृत हो जाता है। स्वास्थ्य विभाग के निरीक्षण में बायोमेडिकल वेस्ट का कॉलम केवल औपचारिकता बनकर रह गया है। अधिकारी हस्ताक्षर कर देते हैं और फाइल आगे बढ़ जाती है। जब मीडिया में खबर आती है तो दो दिन छापेमारी होती है और फिर सब कुछ शांत हो जाता है।

समाधान सख्त निगरानी में है। हर अस्पताल के गेट पर सीसीटीवी लगाना अनिवार्य हो और कचरा उठाने वाले वाहनों की लाइव ट्रैकिंग प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के कंट्रोल रूम से हो। दूसरा समाधान केवल जुर्माना नहीं, बल्कि जेल है। बायोमेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स, 2016 के तहत उल्लंघन पर पांच वर्ष तक की सजा और एक लाख रुपये तक जुर्माने का प्रावधान है, लेकिन आज तक किसी संचालक को जेल नहीं हुई। जब तक दो-चार बड़े अस्पतालों के संचालकों पर कठोर कार्रवाई नहीं होगी, तब तक भय का वातावरण नहीं बनेगा।

जनभागीदारी भी जरूरी है। यदि मोहल्ले के लोग खुले में कचरा जलता देखें तो उसकी फोटो खींचकर सीएम हेल्पलाइन या एनजीटी के माध्यम से शिकायत करें और उसकी पावती लें। प्रशासन को 48 घंटे के भीतर कार्रवाई करनी चाहिए। प्लाज्मा पायरोलिसिस और ऑटोक्लेव जैसी तकनीकों से कचरे का बिना धुआं किए सुरक्षित निस्तारण किया जा सकता है। सरकार को छोटे अस्पतालों के लिए साझा प्लांट स्थापित करने पर प्रोत्साहन देना चाहिए। साथ ही जिस क्षेत्र में खुले में कचरा जलता मिले, वहां के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड अधिकारी, नगर निगम के जोनल अधिकारी और सीएमएचओ की संयुक्त जवाबदेही तय हो। यदि तीन बार ऐसी घटना दोहराई जाए तो उनके विरुद्ध भी कठोर कार्रवाई हो।

एनजीटी को भी अपनी भूमिका अधिक सक्रियता से निभानी होगी। केवल जुर्माना लगाने से काम नहीं चलेगा। उसे हर तीन महीने में राज्यों से अनुपालन रिपोर्ट लेकर सार्वजनिक करनी चाहिए, ताकि लोगों को पता चल सके कि उनके शहर में कितना जैव-चिकित्सा कचरा नियमों के अनुसार नष्ट हुआ और कितना खुले में जलाया गया। अस्पताल जीवन बचाने की जगह हैं, लेकिन जब वही अस्पताल बीमारी फैलाने लगें तो चिंता स्वाभाविक है। राजधानी की सड़कों पर जलता कचरा केवल नियमों की धज्जियां नहीं उड़ा रहा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के फेफड़ों में जहर भर रहा है। यदि नौकरशाही की उदासीनता और एनजीटी की सुस्ती इसी तरह जारी रही तो एक दिन यह धुआं मंत्रालय के कमरों तक भी पहुंचेगा। इसलिए समय की मांग है कि कचरा केवल इंसीनेटर में जले, सड़क पर नहीं, और लापरवाहों पर ऐसी कार्रवाई हो कि दोबारा नियम तोड़ने का साहस न कर सकें। तभी कानून का राज स्थापित होगा और लोगों की सांसें सुरक्षित रह सकेंगी।

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