सत्ता की छतरी फिलहाल धूप और बारिश दोनों से बचा रही है, लेकिन न्याय के मंदिर की घंटियां कुछ ज्यादा ही सुनाई देने लगी हैं। समर्थकों के चेहरे पर भी अब पहले जैसी बेफिक्री नहीं है।
वे धीरे-धीरे पूछने लगे हैं कि आखिर यह सुरक्षा कवच कब तक साथ निभाएगा। राजनीति में मौसम बदलते देर नहीं लगती।



















