संपादकीय
06 Jul, 2026

स्लीपर सेल की राजनीति: संगठन को खोखला करता आपसी दुराग्रह

मध्य प्रदेश कांग्रेस में हालिया घटनाक्रम ने संगठन के भीतर गुटबाजी, नेतृत्व, अनुशासन और एकजुटता को लेकर नई राजनीतिक चर्चा शुरू कर दी है।

भोपाल, 6 जुलाई।

किसी भी राजनीतिक दल के लिए सबसे बड़ा खतरा बाहर का विरोधी नहीं, बल्कि भीतर बैठे वे लोग होते हैं जो अपने ही संगठन को कमजोर करते हैं। राजनीति की भाषा में आजकल इसे 'स्लीपर सेल' कहा जा रहा है। यह शब्द कभी जासूसी, आतंकवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा के संदर्भ में गुप्त एजेंटों के लिए इस्तेमाल होता था, लेकिन अब मध्य प्रदेश कांग्रेस में इसका प्रयोग अपने ही नेताओं के लिए होने लगा है। जब एक पूर्व मुख्यमंत्री को सार्वजनिक बैठक में 'स्लीपर सेल', 'दलाल' और 'लंगड़ा घोड़ा' जैसे शब्दों से संबोधित किया जाए, तो यह संगठन की आंतरिक स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

मध्य प्रदेश कांग्रेस की हालिया पीसीसी बैठक में जो कुछ हुआ, वह केवल एक नेता का अपमान नहीं था, बल्कि उस राजनीतिक विरासत पर भी सवाल था जिसने राज्य में पार्टी को दो बार सत्ता तक पहुंचाया। किसी नेता की कार्यशैली से असहमति हो सकती है, लेकिन उसके योगदान को नकारा नहीं जा सकता। जिस नेता ने संगठन को मजबूत किया, चुनाव जिताए और विपक्ष में रहते हुए भी पार्टी को सक्रिय बनाए रखा, उसे यदि अपनी ही पार्टी के मंच पर कटघरे में खड़ा किया जाए तो कार्यकर्ताओं के बीच क्या संदेश जाएगा?

समस्या केवल शब्दों की नहीं, बल्कि सोच की है। आज कांग्रेस की राजनीति संगठन से अधिक पदों के इर्द-गिर्द सिमटती दिखाई देती है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष जैसे पदों पर नियुक्ति के बाद गुटबाजी बढ़ती है और हर गुट दूसरे को कमजोर करने में लग जाता है। कमलनाथ के बाद जब प्रदेश नेतृत्व का फैसला सीधे दिल्ली से हुआ तो यह संदेश भी गया कि राज्य के वरिष्ठ नेताओं की भूमिका सीमित होती जा रही है। राज्यसभा के चयन को लेकर उठे सवालों ने भी इस असंतोष को और गहरा किया।

कांग्रेस का इतिहास बताता है कि जब भी संगठन में उपेक्षा और असंतोष बढ़ा, कई बड़े नेताओं ने पार्टी छोड़ी। हर बार आरोप प्रतिद्वंद्वी दलों पर लगा, लेकिन वास्तविकता यह भी है कि पहले संगठन के भीतर दरारें पैदा हुईं, फिर परिस्थितियों ने उन्हें और चौड़ा कर दिया। मध्य प्रदेश में कमलनाथ सरकार का गिरना और बाद की राजनीतिक घटनाएं भी संगठनात्मक कमजोरी की ओर संकेत करती हैं।

विधानसभा चुनाव निकट हैं और पहले से ही कई नेता खुद को संभावित मुख्यमंत्री के रूप में प्रस्तुत करने में जुटे हैं। सोशल मीडिया, बयानबाजी और प्रचार अपनी जगह हैं, लेकिन चुनाव अंततः कार्यकर्ताओं की मेहनत और संगठन की मजबूती से जीते जाते हैं। जब अपने ही नेता एक-दूसरे पर सार्वजनिक रूप से आरोप लगाने लगें तो विरोधी दल को अतिरिक्त प्रयास करने की आवश्यकता नहीं रहती।

किसी भी दल की सबसे बड़ी ताकत उसका संगठन और वरिष्ठ नेताओं का अनुभव होता है। यदि इन्हीं को कमजोर किया जाएगा तो चुनावी सफलता की उम्मीद करना कठिन होगा। मतभेद लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा हैं, लेकिन मनभेद संगठन को भीतर से खोखला कर देते हैं। इसलिए समय की मांग है कि पार्टी आत्ममंथन करे, वरिष्ठ नेताओं का सम्मान बनाए रखे और संगठन को व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से ऊपर रखे। अंततः जनता केवल वादे नहीं, बल्कि संगठन की एकजुटता और विश्वसनीयता भी देखती है, और वही चुनावी परिणाम तय करती है।

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