संपादकीय
16 Jul, 2026

स्मार्ट सिटी के नाम पर स्मार्ट लूट:15 करोड़ फूंक डाले और बचा कचरा

भोपाल की स्मार्ट सिटी परियोजनाओं पर हुए खर्च और उनकी वर्तमान स्थिति को लेकर जवाबदेही, रखरखाव तथा प्रभावशीलता पर कई सवाल उठ रहे हैं।

भोपाल, 16 जुलाई।

भोपाल को स्मार्ट बनाने के नाम पर जो तमाशा हुआ, वह अब किसी से छिपा नहीं है। 15 करोड़ रुपये पानी की तरह बहा दिए गए और हाथ आया तो सिर्फ टूटा-फूटा डस्टबिन और कचरे से भरा अंडरग्राउंड स्मार्ट स्टेशन। यह स्मार्ट सिटी नहीं, स्मार्ट लूट है और यह लूट सेंसर वाले स्मार्ट डस्टबिन के नाम पर की गई है।

पांच करोड़ रुपये रियल टाइम टाउन प्रोजेक्ट में उड़ा दिए गए। दस करोड़ रुपये स्मार्ट साइकिल और स्मार्ट डस्टबिन प्रोजेक्ट में झोंक दिए गए। कुल 15 करोड़ रुपये का हिसाब है और नतीजा शून्य। आज शहर की सड़कों पर वही पुराने कूड़ेदान खड़े हैं, वही बदबू और वही गंदगी। डस्टबिन सेंसर से खुलने का दावा करते थे, लेकिन वे खुद ही कबाड़ बन चुके हैं। अंडरग्राउंड स्मार्ट स्टेशन, जिस पर 28 लाख रुपये खर्च हुए, आज कचरे का अड्डा बन चुका है। उसका ऑटोमेटिक ढक्कन दो दिन चला और फिर हमेशा के लिए बंद हो गया।

यह पहला घोटाला नहीं है। यह उसी सोच का नतीजा है, जहां विकास के नाम पर कमीशन तय होता है और जनता को ठेंगा दिखाया जाता है। स्मार्ट सिटी का मतलब था शहर में तकनीक, सफाई, सुविधा और पारदर्शिता। भोपाल में स्मार्ट सिटी का मतलब बन गया ठेकेदारी, मोटा मुनाफा और कागजों पर विकास।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि 15 करोड़ रुपये किसकी जेब में गए? टेंडर किसे मिला? सामान कहां से आया? गुणवत्ता की जांच किसने की? किस अधिकारी ने फाइल पास की और किसने हरी झंडी दी? जवाब कोई नहीं देगा, क्योंकि इस व्यवस्था में जवाबदेही नाम की चीज बची ही नहीं है।

जमीन पर हकीकत देखिए। स्मार्ट डस्टबिन लगाने के लिए पहले सड़कें खोदी गईं, फिर पाइपलाइन बिछी, फिर सेंसर लगाए गए और उसके बाद सब बंद हो गया। अब वही जगह गड्ढों में तब्दील है और नगर निगम कहता है कि मेंटेनेंस नहीं हो पा रहा। मतलब पैसा खर्च करने के बाद भी रखरखाव के लिए पैसा नहीं। यह कैसी स्मार्टनेस है, जहां मशीनें दो महीने भी नहीं चलतीं?

दूसरी तरफ स्मार्ट साइकिल प्रोजेक्ट था। दावा किया गया कि शहर में 2500 साइकिलें दौड़ेंगी, ऐप से बुक होंगी और पर्यावरण बचेगा। हकीकत यह है कि साइकिलें गायब हैं, स्टैंड टूटे पड़े हैं और जो बची हैं, वे भी बेकार हैं। लाखों सदस्यों के जुड़ने का दावा किया गया, लेकिन आज कोई पूछने वाला नहीं। प्रोजेक्ट शुरू करने के बाद उसे भुला दिया गया और फाइल बंद कर दी गई।

यह सिर्फ पैसे की बर्बादी नहीं, बल्कि जनता के भरोसे की हत्या है। जिस शहर में हर गली में कचरा पड़ा हो, जहां नालियां जाम हों और पीने का पानी टैंकर से आता हो, वहां 15 करोड़ रुपये सेंसर वाले डस्टबिन पर खर्च करना जनता के साथ अन्याय है।

अब समय आ गया है कि पूरे प्रोजेक्ट का सार्वजनिक ऑडिट हो, जिम्मेदारों की जवाबदेही तय हो और दोषियों पर कार्रवाई हो। विकास दिखावे से नहीं, ईमानदार काम और जवाबदेही से होता है।

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