संपादकीय
16 Jul, 2026

2047 का लक्ष्य: स्वास्थ्य अनुसंधान में विश्वगुरु बने भारत शोध में बढ़ेगा निवेश, इलाज होगा सस्ता और सुलभ

केंद्र सरकार ने वर्ष 2047 तक स्वास्थ्य अनुसंधान में निवेश बढ़ाकर भारत को वैश्विक स्तर पर अग्रणी बनाने और आम नागरिकों के लिए उपचार को अधिक सुलभ एवं किफायती बनाने का रोडमैप तैयार किया है।

नई दिल्ली, 16 जुलाई।

2047 में जब भारत आजादी के 100 वर्ष पूरे करेगा, तब उसकी पहचान केवल दुनिया की सबसे बड़ी आबादी या प्रमुख अर्थव्यवस्था के रूप में नहीं होगी। उस पहचान का सबसे मजबूत आधार स्वास्थ्य क्षेत्र हो सकता है। केंद्र सरकार ने इसी सोच के साथ एक महत्वाकांक्षी रोडमैप तैयार किया है। इसका लक्ष्य भारत को स्वास्थ्य अनुसंधान की वैश्विक महाशक्ति बनाना है। इसके लिए 2047 तक स्वास्थ्य अनुसंधान पर होने वाला खर्च बढ़ाकर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 0.15 प्रतिशत करने की योजना है। वर्तमान में भारत जीडीपी का केवल 0.024 प्रतिशत स्वास्थ्य अनुसंधान पर खर्च करता है, जबकि अमेरिका 0.4 प्रतिशत से अधिक, दक्षिण कोरिया लगभग 0.3 प्रतिशत और ब्रिटेन करीब 0.2 प्रतिशत खर्च करते हैं। इस अंतर को कम करने के लिए सरकार ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य शोध ड्राफ्ट नीति और पहला राष्ट्रीय स्वास्थ्य अनुसंधान एजेंडा तैयार किया है।

अब तक भारत में स्वास्थ्य अनुसंधान कुछ चुनिंदा संस्थानों और प्रयोगशालाओं तक सीमित रहा है। शोध पत्र प्रकाशित होते रहे, लेकिन उनका आम लोगों के जीवन पर कितना प्रभाव पड़ा, इस पर कम ध्यान दिया गया। नई नीति इस सोच को बदलने का प्रयास करती है। अब शोध का मूल्य उसकी सामाजिक उपयोगिता से तय होगा। उद्देश्य केवल समस्याओं की पहचान करना नहीं, बल्कि उनके व्यावहारिक समाधान विकसित करना है। इसी कारण पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर यह तय किया जा रहा है कि सीमित संसाधनों का उपयोग किन बीमारियों, तकनीकों और क्षेत्रों में किया जाए।

इस एजेंडे में टीबी, कैंसर, मानसिक स्वास्थ्य, मातृ एवं नवजात मृत्यु दर जैसी पुरानी चुनौतियों को प्राथमिकता दी गई है। साथ ही जलवायु परिवर्तन से जुड़ी बीमारियां, महामारी, एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस, मोटापा, मधुमेह और हृदय रोग जैसी नई चुनौतियों को भी शामिल किया गया है। बदलती जीवनशैली और बढ़ते स्वास्थ्य संकट को देखते हुए इन विषयों पर व्यापक शोध की आवश्यकता है।

नई नीति की सबसे बड़ी विशेषता आधुनिक तकनीक पर विशेष जोर है। पहली बार कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), रोबोटिक्स, जीन थेरेपी, डिजिटल हेल्थ और डेटा साइंस को राष्ट्रीय प्राथमिकता में रखा गया है। भविष्य में एआई की मदद से गांव में बैठे मरीज की जांच रिपोर्ट कुछ ही मिनटों में उपलब्ध हो सकेगी। रोबोटिक सर्जरी दूरदराज के क्षेत्रों तक पहुंच सकती है और जीन थेरेपी से आनुवंशिक बीमारियों का उपचार अधिक प्रभावी तथा सस्ता बनाया जा सकेगा। सरकार का विश्वास है कि यही तकनीकें भारत को वैश्विक स्वास्थ्य अनुसंधान में अग्रणी बना सकती हैं।

2047 तक स्वास्थ्य अनुसंधान पर खर्च को वर्तमान स्तर से लगभग छह गुना बढ़ाया जाएगा। यह निवेश केवल सरकारी बजट तक सीमित नहीं रहेगा। निजी अस्पतालों, दवा कंपनियों, स्टार्टअप, विश्वविद्यालयों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को भी इस अभियान से जोड़ा जाएगा। लक्ष्य स्पष्ट है कि भारत को दुनिया के शीर्ष स्वास्थ्य अनुसंधान देशों में स्थान दिलाया जाए। इससे नए अनुसंधान केंद्र स्थापित होंगे, मेडिकल कॉलेजों में पीएचडी की सीटें बढ़ेंगी, शोधार्थियों को फेलोशिप मिलेगी और उद्योगों को भी प्रोत्साहन मिलेगा।

भारत में प्रति 10 लाख आबादी पर मेडिकल साइंस के केवल लगभग 1.5 पीएचडी शोधार्थी हैं, जबकि विकसित देशों में यह संख्या 10 से 25 के बीच है। कोविड-19 महामारी के दौरान भारत ने स्वदेशी वैक्सीन विकसित कर अपनी क्षमता का परिचय दिया था, लेकिन केवल एक उपलब्धि से कोई देश अनुसंधान महाशक्ति नहीं बनता। आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टरों की कमी है, दवाएं महंगी हैं और सामान्य जांच के लिए भी लोगों को बड़े शहरों का रुख करना पड़ता है। टीबी और मलेरिया जैसी बीमारियां अभी समाप्त नहीं हुई हैं, जबकि कैंसर और हृदय रोग तेजी से बढ़ रहे हैं। इन सभी चुनौतियों का स्थायी समाधान केवल मजबूत अनुसंधान से ही निकलेगा।

इस रोडमैप का सीधा लाभ आम नागरिक को मिलेगा। यदि नई दवाएं और तकनीक भारत में विकसित होंगी तो आयात पर निर्भरता घटेगी और इलाज की लागत कम होगी। एआई और डिजिटल हेल्थ के माध्यम से प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में भी बेहतर जांच सुविधाएं उपलब्ध हो सकेंगी। भविष्य में यदि कोई महामारी आती है तो भारत को दूसरे देशों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। देश स्वयं वैक्सीन और दवाओं का विकास कर सकेगा। साथ ही बायोटेक स्टार्टअप, लैब तकनीशियन, डेटा साइंटिस्ट और शोधकर्ताओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे।

हालांकि केवल बजट बढ़ाने से लक्ष्य हासिल नहीं होगा। अनुसंधान की स्वीकृति प्रक्रिया सरल और पारदर्शी बनानी होगी। क्लिनिकल ट्रायल से जुड़े नियमों में आवश्यक सुधार करने होंगे। डॉक्टरों को केवल चिकित्सक नहीं, बल्कि शोधकर्ता भी बनना होगा। इंजीनियरों को स्वास्थ्य तकनीक विकसित करनी होगी और युवाओं को अनुसंधान को आकर्षक करियर के रूप में अपनाना होगा।

भारत के पास विविध आबादी, विविध बीमारियां और विशाल स्वास्थ्य डेटा उपलब्ध है। यदि इस डेटा का सुरक्षित और वैज्ञानिक उपयोग किया जाए तो भारत एआई आधारित स्वास्थ्य सेवाओं का वैश्विक केंद्र बन सकता है। स्वास्थ्य मंत्रालय ने इसके लिए 10 बड़े अनुसंधान हब स्थापित करने, राज्यों में शोध नेटवर्क विकसित करने, निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने और मरीज की सहमति पर आधारित राष्ट्रीय स्वास्थ्य डेटा प्लेटफॉर्म तैयार करने की योजना बनाई है।

2047 का भारत कैसा होगा, यह काफी हद तक उसके स्वास्थ्य तंत्र पर निर्भर करेगा। स्वस्थ नागरिक ही मजबूत अर्थव्यवस्था और समृद्ध राष्ट्र की नींव होते हैं। इसलिए स्वास्थ्य अनुसंधान पर किया गया प्रत्येक निवेश भविष्य की सुरक्षा में किया गया निवेश है। अब जिम्मेदारी वैज्ञानिकों, चिकित्सकों, उद्योग जगत और समाज सभी की है कि वे इस अवसर को राष्ट्रीय अभियान में बदलें। यदि यह प्रयास सफल हुआ तो आने वाले वर्षों में भारत केवल अपनी जरूरतें पूरी नहीं करेगा, बल्कि दुनिया को नई दवाएं, नई तकनीक और नई स्वास्थ्य दृष्टि भी देगा।

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