भोपाल, 16 जुलाई।
भोपाल में नगर निगम की एक कार्रवाई ने पूरे कोचिंग तंत्र की सच्चाई सामने ला दी है। शहर के 31 कोचिंग संस्थानों को एक साथ सील कर दिया गया, क्योंकि वहां अग्नि सुरक्षा के नाम पर लगभग कुछ भी नहीं था। यह कदम ऐसे समय उठाया गया, जब एक हादसे के बाद पूरे देश में कोचिंग संस्थानों की सुरक्षा पर बहस शुरू हुई। सवाल यह है कि प्रशासन हमेशा किसी दुर्घटना के बाद ही क्यों जागता है?
कोचिंग आज शिक्षा नहीं, बल्कि बड़ा बाजार बन चुकी है। लाखों रुपये फीस लेने वाले कई संस्थानों ने सुरक्षा पर न्यूनतम निवेश भी नहीं किया। जांच में सामने आया कि अधिकांश के पास फायर एनओसी (NOC) नहीं थी। 10 हजार लीटर पानी की टंकी, 450 एलपीएम (LPM) क्षमता का फायर पंप, इमरजेंसी निकास, धुआं निकालने की व्यवस्था और नियमित मॉक ड्रिल जैसी अनिवार्य व्यवस्थाएं भी नहीं थीं। कई जगह कर्मचारियों को अग्निशमन यंत्र चलाना तक नहीं आता था।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि ये संस्थान वर्षों से चल रहे थे तो निरीक्षण कौन कर रहा था? लाइसेंस किस आधार पर दिए गए? अब जब 31 संस्थान बंद हुए तो हजारों छात्रों की पढ़ाई प्रभावित हुई है, तो उनकी फीस का क्या होगा?
नियम स्पष्ट हैं कि 200 से अधिक क्षमता वाले बेसमेंट में कोचिंग नहीं चल सकती। ऑटोमैटिक डोर लॉक, फायर सिस्टम और नियमित मॉक ड्रिल अनिवार्य हैं। इसके बावजूद कई संचालकों ने किराया बचाने के लिए तहखानों में कक्षाएं चलाईं और सुरक्षा को नजरअंदाज किया।
सरकार को चाहिए कि हर कोचिंग संस्थान की फायर एनओसी और सुरक्षा रिपोर्ट सार्वजनिक पोर्टल पर उपलब्ध कराए। नियम तोड़ने वाले संचालकों के साथ-साथ लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों की भी जवाबदेही तय हो। कोचिंग का उद्देश्य भविष्य बनाना है, उसे छात्रों की सुरक्षा से समझौता करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।












