नई दिल्ली, 16 जुलाई।
भारत में महिलाओं की शादी की औसत उम्र 19.3 वर्ष से बढ़कर 23.1 वर्ष हो गई है। शहरों में यह 24.4 वर्ष और गांवों में 22.6 वर्ष तक पहुंच चुकी है। यह बदलाव केवल एक सांख्यिकीय तथ्य नहीं, बल्कि बदलते भारतीय समाज की नई तस्वीर है। शिक्षा, करियर, आर्थिक आत्मनिर्भरता और बढ़ती जागरूकता ने विवाह की पारंपरिक सोच को बदलना शुरू कर दिया है।
आज अधिकतर परिवार चाहते हैं कि बेटियां पहले उच्च शिक्षा प्राप्त करें, रोजगार हासिल करें और आर्थिक रूप से सक्षम बनें। बढ़ती महंगाई और घर बसाने की लागत ने भी विवाह की उम्र बढ़ाने में भूमिका निभाई है। साथ ही, किशोर विवाह रोकने और महिलाओं के स्वास्थ्य एवं पोषण को लेकर चलाए गए सरकारी अभियानों का भी सकारात्मक प्रभाव दिखाई दे रहा है।
इस बदलाव के कई लाभ हैं। देर से विवाह होने पर मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य बेहतर रहता है, किशोरावस्था में गर्भधारण की आशंका घटती है और महिलाओं की कार्यबल में भागीदारी बढ़ती है। छोटे परिवार बनने से शिक्षा और स्वास्थ्य पर प्रति व्यक्ति निवेश भी बढ़ सकता है।
इसके कुछ दीर्घकालिक प्रभाव भी सामने आ सकते हैं। देर से विवाह और मातृत्व के कारण प्रजनन दर में लगातार गिरावट आ रही है। कई राज्यों में यह पहले ही प्रतिस्थापन स्तर से नीचे पहुंच चुकी है। भविष्य में कामकाजी युवाओं की संख्या घटने और बुजुर्ग आबादी बढ़ने से पेंशन, स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक सुरक्षा पर दबाव बढ़ सकता है। विवाह की बदलती आयु सामाजिक संरचना और विवाह बाजार को भी प्रभावित करेगी।
विवाह की बढ़ती उम्र महिला सशक्तिकरण का सकारात्मक संकेत है, लेकिन इसके साथ बदलती जनसांख्यिकीय चुनौतियों को भी समझना होगा। सरकार को शिक्षा, कौशल विकास, सुरक्षित रोजगार और वृद्धजन देखभाल की नीतियों पर समानांतर रूप से काम करना होगा। तभी यह सामाजिक बदलाव देश के विकास का आधार बन सकेगा।












