न्यायपालिका
16 Jul, 2026

रजिस्ट्रेशन बिना भी वैध हो सकती है वसीयत

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि वसीयत का पंजीकरण अनिवार्य नहीं है और केवल अपंजीकृत होने के आधार पर उसकी वैधता पर संदेह नहीं किया जा सकता।

नई दिल्ली, 16 जुलाई।

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान एवं न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ ने 'पार्वती एन बनाम लक्ष्मी एन' मामले में निर्णय देते हुए स्पष्ट किया है कि कानून के तहत वसीयत का पंजीकरण अनिवार्य नहीं है और केवल पंजीकरण न होने के आधार पर किसी वसीयत को संदिग्ध नहीं माना जा सकता। न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ ने कहा, "कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जिसके तहत वसीयत का पंजीकरण अनिवार्य हो। अधिकांश मामलों में वसीयत पंजीकृत नहीं होती। केवल इसी आधार पर उसकी प्रामाणिकता पर प्रश्न उठाना पूरी तरह अनुचित है।" पीठ ने 1953 के 'ईश्वरदेव नारायण सिंह बनाम कमता देवी' मामले का हवाला देते हुए यह भी कहा कि यदि वसीयत के आसपास कोई संदिग्ध परिस्थिति हो तो उसकी गहन जांच की जा सकती है, लेकिन अपंजीकृत होना अपने आप में संदेह का कारण नहीं है। यह फैसला कर्नाटक के उडुपी निवासी बी. शीना नायरी द्वारा वर्ष 1983 में लिखी गई वसीयत को बरकरार रखते हुए दिया गया, जिसमें उन्होंने अपनी कृषि एवं अन्य संपत्ति अपनी पत्नी और बच्चों के बजाय अपनी बहन लक्ष्मी नायरथी के नाम की थी।

पीठ ने एक और महत्वपूर्ण बात यह कही कि वसीयत में प्राकृतिक वारिसों को संपत्ति से बाहर रखना भी अपने आप में संदिग्ध परिस्थिति नहीं है, क्योंकि वसीयत का उद्देश्य ही उत्तराधिकार की सामान्य व्यवस्था को बदलना होता है। पीठ ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी संपत्ति का अपनी इच्छा के अनुसार निपटान करने का कानूनी अधिकार है। जब तक वारिसों को बाहर रखने के साथ वसीयत के निष्पादन या उसकी प्रामाणिकता को लेकर कोई अन्य संदेहास्पद परिस्थिति न हो, तब तक केवल बहिष्कार के आधार पर वसीयत को अमान्य नहीं ठहराया जा सकता। इस मामले में वसीयत में यह उल्लेख था कि नायरी ने अपनी पत्नी और बच्चों के साथ अन्याय नहीं किया है तथा मुंबई में रहने वाले अपने परिवार के लिए पहले ही पर्याप्त प्रबंध कर दिया है। साथ ही न्यायालय ने कहा कि राजस्व अभिलेखों में नाम दर्ज होना स्वामित्व का प्रमाण नहीं है, क्योंकि उनका उद्देश्य केवल राजस्व प्रशासन होता है। एक गवाह के बयान से वसीयत का स्वेच्छा से और विधिवत निष्पादन सिद्ध होने तथा जालसाजी का कोई साक्ष्य न मिलने के कारण सर्वोच्च न्यायालय ने ट्रायल कोर्ट, प्रथम अपीलीय अदालत और कर्नाटक उच्च न्यायालय के निर्णयों से सहमति जताते हुए वसीयत को वैध माना।

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