भोपाल, 17 जुलाई।
कभी-कभी अंदर की बातें इतनी जोर से बाहर आती हैं कि पर्दा अपने आप फट जाता है। तबादले हमेशा से विवाद का विषय रहे हैं। लेकिन अब जब सामाजिक न्याय एवं उद्यानिकी मंत्री खुद अपने विभाग के सचिव पर 'इंटरेस्ट' के आधार पर तबादले करने का आरोप लगाएं, तो किसी सबूत की जरूरत नहीं रह जाती। मंत्री ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर शिकायत की कि सचिव ने अपने इंटरेस्ट के अनुसार तबादले कर दिए। सचिव का जवाब भी तुरंत आ गया कि जिन तबादलों पर सहमति बनी थी, उनमें मंत्री स्तर पर बदलाव किया गया, इसलिए उन्हें रोका गया। तबादला सीजन खत्म हो गया, लेकिन विवाद अभी बाकी है।
यह लड़ाई सिर्फ दो कुर्सियों की नहीं, पूरे सिस्टम की साख की है। आम धारणा पहले से ही यही रही है कि कोई तबादला बिना इंटरेस्ट के नहीं होता। अब मंत्री के शब्दों ने उस धारणा पर सरकारी मुहर लगा दी है। हर साल तबादलों का दौर शुरू होते ही इसे कमाई का सीजन कहा जाता है। विपक्ष इसे तबादला उद्योग बताता है और सत्ता इसे प्रशासनिक जरूरत कहती है। इस बार आरोप लगाने वाले और सफाई देने वाले दोनों एक ही सरकार के हिस्से हैं।
तबादला एक प्रशासनिक प्रक्रिया होनी चाहिए, लेकिन अब यह सजा देने, इनाम बांटने और वफादारी परखने का माध्यम बन गई है। चहेतों को मलाईदार पोस्टिंग, विरोधियों को दूरस्थ तबादला और प्रभाव वाले स्थानों पर अपने लोगों की तैनाती आम बात हो गई है। हर साल तबादला नीति जारी होती है, जिसमें न्यूनतम दो वर्ष तक एक स्थान पर रहने का प्रावधान होता है। लेकिन हकीकत यह है कि कोई अधिकारी एक वर्ष में कई बार स्थानांतरित होता है, जबकि कोई वर्षों तक एक ही कुर्सी पर बना रहता है।
कार्य-संचालन नियमों के अनुसार मंत्री और सचिव के बीच विवाद होने पर मामला मुख्य सचिव के माध्यम से मुख्यमंत्री तक जाता है। लेकिन फैसले अक्सर नियमों से ज्यादा सियासी समीकरणों से प्रभावित दिखाई देते हैं। बिना इंटरेस्ट तबादला नहीं होता, यह धारणा अब छिपी नहीं है। मंत्री ने उसी सच्चाई को सार्वजनिक शब्द दे दिए हैं। इसका सबसे बड़ा नुकसान प्रशासन को होता है। अधिकारी काम समझे, उससे पहले उसका तबादला हो जाता है। नई जगह पर कामकाज संभालते-संभालते अगला आदेश आ जाता है। योग्यता पीछे छूट जाती है और वफादारी आगे आ जाती है।
सरकार बदलने पर तबादलों की बाढ़ समझ में आती है, लेकिन एक ही सरकार में लगातार ऐसे विवाद यह बताते हैं कि प्रशासनिक स्थिरता कमजोर पड़ रही है। जनता यह देख रही है कि तबादले जनहित में हो रहे हैं या जेब हित में। सरकार को तय करना होगा कि व्यवस्था नियमों से चलेगी या व्यक्तिगत इंटरेस्ट से। यदि यही स्थिति बनी रही, तो तबादला उद्योग और मजबूत होगा तथा सुशासन की बातें केवल भाषणों तक सीमित रह जाएंगी।












