भोपाल, 17 जुलाई।
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की नई गाइडलाइन ने छोटे क्लीनिकों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। अब फिजियोथेरेपिस्ट, होम्योपैथी, आयुष और अन्य पद्धतियों के डॉक्टरों को भी बायोमेडिकल वेस्ट ऑथोराइजेशन लेना पड़ेगा, जबकि इन जगहों पर न सुई लगती है, न खून निकलता है और न ही कोई संक्रामक कचरा उत्पन्न होता है। बायोमेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स का मकसद अस्पतालों और लैब से निकलने वाले खतरनाक कचरे का सुरक्षित निपटान सुनिश्चित करना है।
इंजेक्शन, सिरिंज और खून से सने सामान से संक्रमण फैल सकता है। इसलिए बड़े अस्पतालों पर निगरानी जरूरी है। पर अब उसी नियम को बिना किसी भेदभाव के सभी चिकित्सकीय प्रतिष्ठानों पर लागू किया जा रहा है। फिजियोथेरेपी में केवल व्यायाम और मशीनों का उपयोग होता है। आयुर्वेद और होम्योपैथी में जड़ी-बूटियां और दवाएं दी जाती हैं। इन जगहों पर बायोमेडिकल वेस्ट का सवाल ही नहीं उठता। फिर भी उन्हें प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में पंजीकरण कराना होगा, फीस देनी होगी और हर साल रिपोर्ट भेजनी होगी।
छोटे शहरों और कस्बों में ऐसे हजारों क्लीनिक संचालित हैं। वे पहले से ही आर्थिक दबाव में हैं। अब अतिरिक्त कागजी प्रक्रिया और खर्च उनके लिए बोझ बन जाएगा। कई डॉक्टरों ने इसे अव्यावहारिक बताया है और विरोध शुरू कर दिया है। सरकार का इरादा पर्यावरण और जनस्वास्थ्य की रक्षा करना है, लेकिन जब नियम जमीनी हकीकत को नहीं समझते तो उनका पालन भी कम होता है। जिसके यहां वेस्ट नहीं है, वह भी फॉर्म भरेगा और जिसके यहां वेस्ट है, वह रास्ता निकाल लेगा।
इसका समाधान वर्गीकरण में है। स्वास्थ्य संस्थानों को तीन श्रेणियों में बांटा जाए—बड़े अस्पताल, जहां खतरनाक वेस्ट निकलता है; डेंटल और पैथोलॉजी केंद्र, जहां सीमित वेस्ट होता है; तथा फिजियोथेरेपी और आयुष केंद्र, जहां बायोमेडिकल वेस्ट नहीं बनता। तीसरी श्रेणी को स्वघोषणा की सुविधा मिले। प्रक्रिया भी सरल हो। स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों जरूरी हैं, पर नियम ऐसे हों जिनका पालन व्यावहारिक रूप से संभव हो।












