भोपाल, 17 जुलाई।
भारत की आत्मा गांवों में बसती है। यह बात हम वर्षों से सुनते आ रहे हैं, लेकिन अब यह केवल किताबों और भाषणों तक सीमित नहीं रहेगी। केंद्र सरकार ने गांवों की संस्कृति, परंपरा और प्राकृतिक सुंदरता को रोजगार और अर्थव्यवस्था से जोड़ने का बड़ा फैसला लिया है। इसी कड़ी में निटर (ग्राम उत्कर्ष एवं अनुसंधान संस्थान), भोपाल में 'ग्राम उत्कर्ष दर्शन' के तहत तीन दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किया गया है। इसका उद्देश्य प्रदेशभर के उद्यमियों को गांवों से जोड़कर होमस्टे और ग्रामीण पर्यटन के कारोबार से जोड़ना है।
आज पर्यटक केवल बड़े शहरों और महंगे होटलों तक सीमित नहीं रहना चाहता। वह गांव की मिट्टी की खुशबू, लोकजीवन, लोककला और पारंपरिक भोजन का अनुभव करना चाहता है। इसी मांग को देखते हुए सरकार ने गांवों को पर्यटन के नक्शे पर लाने का निर्णय लिया है। प्रदेश के विभिन्न जिलों से आए उद्यमियों और स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं ने इस प्रशिक्षण में भाग लिया। उन्हें बताया गया कि गांव में खाली पड़े कमरों को कैसे होमस्टे में बदला जा सकता है, मेहमानों का स्वागत कैसे किया जाए, शुद्ध भोजन कैसे उपलब्ध कराया जाए और गांव के जीवन को आकर्षण के रूप में कैसे प्रस्तुत किया जाए, ताकि अतिरिक्त आय अर्जित की जा सके।
होमस्टे केवल कमाई का जरिया नहीं है, बल्कि गांव की संस्कृति को दुनिया तक पहुंचाने का माध्यम भी है। जब कोई शहर का व्यक्ति या विदेशी पर्यटक गांव में कुछ दिन बिताता है, तो वह वहां की हस्तकला, कृषि पद्धति, लोकगीत और खानपान को करीब से देखता और समझता है। इससे गांव की पहचान बनती है और स्थानीय उत्पादों की मांग भी बढ़ती है।
मध्य प्रदेश में प्रकृति और विरासत दोनों की भरपूर संपदा है। पचमढ़ी, कान्हा और बांधवगढ़ के अलावा सैकड़ों ऐसे गांव हैं, जहां प्राकृतिक सौंदर्य और आदिवासी संस्कृति पर्यटकों को आकर्षित कर सकती है। यदि गांवों को पर्यटन से जोड़ा जाए, तो पलायन रुकेगा और युवाओं को अपने गांव में ही रोजगार मिलेगा। होमस्टे शुरू करने के लिए बड़े निवेश की आवश्यकता नहीं है। केवल साफ-सफाई, शुद्ध भोजन और मेहमाननवाजी की भावना चाहिए। सरकार भी इस योजना के तहत प्रशिक्षण, प्रमाण-पत्र, विपणन और बैंक ऋण जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराने की बात कर रही है।
प्रशिक्षण का एक बड़ा फोकस कृषि आधारित पर्यटन पर भी रहा। किसानों को बताया गया कि वे अपने खेतों को भी पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बना सकते हैं। शहर के लोग फसल की बुवाई, कटाई और जैविक खेती का अनुभव करना चाहते हैं। इससे किसानों को खेती के साथ-साथ पर्यटन से भी अतिरिक्त आय मिलेगी। गांव में जो चीजें सामान्य हैं, वही शहर के लोगों के लिए आकर्षण बन सकती हैं। चूल्हे की रोटी, कुएं का पानी, बैलगाड़ी की सवारी और लोकनृत्य जैसे अनुभव पर्यटन का हिस्सा बन सकते हैं।
इस प्रशिक्षण में स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी बड़ी संख्या में महिलाओं ने भी भाग लिया। विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रामीण पर्यटन की सफलता में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका होगी, क्योंकि भोजन, स्वच्छता और आतिथ्य जैसे कार्य वे बेहतर ढंग से निभा सकती हैं। उन्हें यह भी सिखाया गया कि घर के एक हिस्से को होमस्टे में कैसे बदला जाए, ऑनलाइन बुकिंग कैसे ली जाए और घर में बने अचार, पापड़ तथा हस्तशिल्प उत्पादों को पर्यटकों तक कैसे पहुंचाया जाए। इससे उनकी आय बढ़ेगी और गांव में उनकी आर्थिक भूमिका भी मजबूत होगी।
हालांकि, उद्यमियों ने कुछ चुनौतियां भी सामने रखीं। गांवों में सड़क, बिजली, इंटरनेट, स्वच्छ पेयजल और शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी आज भी बड़ी बाधा है। इसके साथ ही लोगों की सोच में बदलाव भी जरूरी है। ये समस्याएं एक दिन में हल नहीं होंगी, लेकिन सरकार, पंचायत और निजी उद्यमी मिलकर काम करें तो बदलाव संभव है।
पहले चरण में उन गांवों को चुना जाएगा, जो पर्यटन स्थलों के निकट हैं या जिनकी अपनी विशिष्ट पहचान है। केंद्र सरकार का लक्ष्य 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाना है, जिसमें ग्रामीण अर्थव्यवस्था की बड़ी भूमिका होगी। इसी सोच के तहत ग्राम उत्कर्ष दर्शन जैसी योजनाएं शुरू की गई हैं। यदि यह पहल प्रभावी ढंग से जमीन पर उतरी और गांवों में सड़क, बिजली, पानी, इंटरनेट के साथ लोगों की सोच भी बदली, तो वह दिन दूर नहीं जब मध्य प्रदेश का हर दूसरा गांव पर्यटन के नक्शे पर होगा और दुनिया कहेगी— भारत को देखना है तो उसके गांव देखो।













