नई दिल्ली, 28 जुलाई।
राष्ट्रीय राजधानी में छात्र प्रदर्शन के दौरान रैपिड एक्शन फोर्स (आरएएफ) द्वारा पेलेट गन के इस्तेमाल को लेकर नया खुलासा सामने आया है। पुलिस की जनरल डायरी (डीडी) एंट्री से संकेत मिला है कि यह कार्रवाई एक डीसीपी स्तर के अधिकारी के निर्देश पर की गई थी। यह दस्तावेज 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर हुए छात्र संगठन सीजेपी के 'संसद चलो' मार्च से जुड़ी घटना का विवरण दर्ज करता है।
दस्तावेज के अनुसार, प्रदर्शन के दौरान भीड़ को नियंत्रित करने के लिए आरएएफ के डिप्टी कमांडेंट ने दंगा-रोधी गन से दो राउंड प्लास्टिक पेलेट कारतूस दागे। इसके अलावा 55 नॉन-इलेक्ट्रिकल शेल, 15 इलेक्ट्रिकल शेल और पांच टियर स्मोक ग्रेनेड का भी इस्तेमाल किया गया। पूरी कार्रवाई डीडी एंट्री में दर्ज होने का दावा किया गया है।
घटना के बाद सोशल मीडिया पर घायल छात्रों, जिनमें शेख इरशाद मंसूरी और साहिल लोचब शामिल थे, की तस्वीरें सामने आने के बाद पेलेट गन के इस्तेमाल को लेकर सवाल उठे थे। उस समय दिल्ली पुलिस ने ऐसे सभी दावों को पूरी तरह भ्रामक बताते हुए कहा था कि उसके पास पेलेट गन उपलब्ध ही नहीं है। हालांकि यह भी स्पष्ट किया गया था कि इस तरह के उपकरण आरएएफ, जो सीआरपीएफ की एक इकाई है, के पास मौजूद होते हैं।
मामले के बाद सीआरपीएफ ने आंतरिक जांच शुरू की। जांच में यह सामने आया कि जंतर-मंतर और कनॉट प्लेस क्षेत्र में आरएएफ के एक जवान द्वारा राउंड फायर किए गए थे, जिससे कई छात्र और एक पत्रकार घायल हुए। इसके बाद आरएएफ की महानिरीक्षक सीमा धुंधिया ने समीक्षा बैठक में बल प्रयोग पर नाराजगी जताई और भविष्य में राष्ट्रीय राजधानी में ड्यूटी के दौरान प्रोजेक्टाइल अटैक गन, इलेक्ट्रिकल हथियारों और इलेक्ट्रिकल शील्ड के इस्तेमाल पर रोक लगाने का निर्णय लिया।
यह मामला अब उच्चतम न्यायालय तक पहुंच चुका है। पूर्व आईपीएस अधिकारी यशोवर्धन आज़ाद तथा अन्य याचिकाकर्ताओं ने नागरिक प्रदर्शनों के दौरान पेलेट गन और अन्य घातक प्रोजेक्टाइल हथियारों के इस्तेमाल पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग करते हुए न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है।












