भोपाल, 1 अगस्त।
औषधीय गुणों से भरपूर गूगल (गुग्गुल) के संरक्षण और संवर्धन के लिए वैज्ञानिक शोध, किसानों के प्रशिक्षण और सरकारी स्तर पर ठोस प्रयास जरूरी हैं। यह बात सामाजिक संस्था सुजागृति से जुड़े जाकिर हुसैन ने शनिवार को कही।
उन्होंने कहा कि गूगल देश की प्रमुख औषधीय वनस्पतियों में शामिल है। इसका उपयोग आयुर्वेदिक औषधियों के अलावा धूप, अगरबत्ती, इत्र और अन्य उत्पादों के निर्माण में किया जाता है। इसके बावजूद संरक्षण की कमी और गलत तरीके से दोहन के कारण यह प्रजाति धीरे-धीरे विलुप्ति के खतरे की ओर बढ़ रही है।
जाकिर हुसैन ने बताया कि सुजागृति संस्था पिछले कई वर्षों से गूगल के संरक्षण के लिए पौधरोपण अभियान चला रही है। हर वर्ष बड़ी संख्या में पौधे लगाए जाते हैं, लेकिन रासायनिक पदार्थों का उपयोग कर गलत तरीके से चीरा लगाने के कारण अनेक पौधे नष्ट हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि जागरूकता बढ़ने के बाद कुछ किसान वैज्ञानिक तरीके से गोंद निकाल रहे हैं, फिर भी कई स्थानों पर अब भी गलत पद्धति अपनाई जा रही है।
उन्होंने सुझाव दिया कि अनुसंधान एवं विकास (आरएंडडी) के माध्यम से अधिक से अधिक गूगल के पौधे तैयार किए जाएं और उनका रोपण वन भूमि, राजस्व भूमि तथा किसानों के खेतों में किया जाए। साथ ही पौधों के संरक्षण और नियमित देखभाल पर भी विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि गूगल के बीजों का अंकुरण प्रतिशत अभी काफी कम है। इसकी अंकुरण क्षमता बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक अनुसंधान की जरूरत है। इसके साथ ही पौधों को नुकसान पहुंचाए बिना गोंद निकालने की वैज्ञानिक और व्यवहारिक तकनीक विकसित की जानी चाहिए, ताकि किसानों को आर्थिक लाभ मिलने के साथ इस प्रजाति का संरक्षण भी सुनिश्चित हो सके।
जाकिर हुसैन ने किसानों को विनाशरहित विदोहन की तकनीक का नियमित प्रशिक्षण देने पर जोर देते हुए कहा कि यदि सरकार, वैज्ञानिक संस्थान और किसान मिलकर कार्य करें तो गूगल संरक्षण को प्रभावी बनाया जा सकता है। इससे औषधीय जरूरतों की पूर्ति के साथ भविष्य में इसके निर्यात की संभावनाओं को भी बढ़ावा मिलेगा।






















