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संपादकीय
01 Aug, 2026

दूषित भोजन, पानी और असुरक्षित आदतों से बढ़ रहा है हेपेटाइटिस का खतरा, हर माह अस्पतालों में पहुंच रहे हैं सैकड़ों मरीज

मध्यप्रदेश में बढ़ते हेपेटाइटिस संक्रमण के बीच दूषित पानी, अस्वच्छ भोजन और असुरक्षित आदतों से बचाव के लिए स्वच्छता, टीकाकरण और समय पर उपचार की आवश्यकता पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।

भोपाल, 01 अगस्त।

मध्यप्रदेश में हेपेटाइटिस के मामले लगातार बढ़ रहे हैं और यह अब केवल मौसमी बीमारी नहीं रह गई है, बल्कि गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या बन चुकी है। इंदौर, भोपाल, जबलपुर और ग्वालियर जैसे बड़े शहरों के अस्पतालों में हर माह 50 से 60 नए मरीज हेपेटाइटिस के इलाज के लिए पहुंच रहे हैं। सरकारी और निजी अस्पतालों के आंकड़े बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में इस बीमारी के मामलों में लगभग 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि अब यह बीमारी केवल वयस्कों तक सीमित नहीं रही, बल्कि बच्चे और युवा भी इसकी चपेट में आ रहे हैं। डॉक्टरों का कहना है कि इसका मुख्य कारण दूषित भोजन, दूषित पानी और लोगों की लापरवाह जीवनशैली है।

हेपेटाइटिस एक ऐसी बीमारी है, जो लीवर को प्रभावित करती है और समय पर इलाज न मिलने पर लीवर फेलियर तक की नौबत आ सकती है। इसके कई प्रकार हैं—हेपेटाइटिस ए, बी, सी और ई। इनमें हेपेटाइटिस ए और ई दूषित पानी और भोजन के माध्यम से फैलते हैं, जबकि हेपेटाइटिस बी और सी संक्रमित रक्त, असुरक्षित यौन संबंध तथा असुरक्षित चिकित्सा उपकरणों के उपयोग से फैलते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि प्रदेश में सबसे अधिक मामले हेपेटाइटिस ए और ई के सामने आ रहे हैं, जिनका सीधा संबंध गंदे पानी और साफ-सफाई की कमी से है।

बारिश के मौसम में यह समस्या और गंभीर हो जाती है। इस दौरान नालियों का पानी पेयजल में मिल जाता है और सड़क किनारे बिकने वाले खाद्य पदार्थों में भी गंदगी बढ़ जाती है। अस्पतालों के गैस्ट्रोएंटेरोलॉजी विभागों में प्रतिदिन मरीजों की लंबी कतारें लग रही हैं। अधिकांश मरीज उल्टी, दस्त, बुखार और पीलिया की शिकायत लेकर आते हैं। जांच में पता चलता है कि वे हेपेटाइटिस से संक्रमित हैं। शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज करने के कारण कई मरीज गंभीर अवस्था में अस्पताल पहुंचते हैं, जिससे इलाज में अधिक समय और खर्च लगता है।

शहरों में तेजी से बढ़ती बाहर खाने की संस्कृति ने भी इस बीमारी को बढ़ावा दिया है। स्ट्रीट फूड, ठेलों और कई रेस्टोरेंट में इस्तेमाल होने वाले पानी और बर्तनों की सफाई पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता। कई स्थानों पर एक ही तेल में बार-बार खाद्य पदार्थ तले जाते हैं और बासी भोजन परोसा जाता है। इसके अलावा टैटू बनवाना, बिना जांच के रक्त चढ़वाना और एक ही सिरिंज का दोबारा उपयोग करना भी हेपेटाइटिस बी और सी के प्रमुख कारण हैं। युवाओं में टैटू और बॉडी पियर्सिंग का बढ़ता चलन भी चिंता का विषय है, क्योंकि अनेक स्थानों पर स्टरलाइजेशन के नियमों का पालन नहीं किया जाता।

हेपेटाइटिस से बचाव पूरी तरह संभव है, यदि थोड़ी सावधानी बरती जाए। सबसे पहले पीने के पानी की शुद्धता सुनिश्चित करनी चाहिए। उबला हुआ या शुद्ध पानी ही पीना चाहिए। बाहर भोजन करने से पहले उसकी स्वच्छता पर ध्यान देना जरूरी है। कच्ची सब्जियों और फलों को अच्छी तरह धोकर ही उपयोग करना चाहिए। खाना खाने से पहले और शौच के बाद हाथ धोने की आदत संक्रमण से बचाव का सरल और प्रभावी उपाय है। इसके अलावा हेपेटाइटिस बी का टीकाकरण सबसे प्रभावी सुरक्षा कवच है। यह टीका बच्चों को जन्म के समय लगाया जाता है, लेकिन वयस्क भी इसे लगवा सकते हैं। हेपेटाइटिस ए का टीका भी उपलब्ध है।

सरकार की ओर से भी इस दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग ने स्कूलों और कॉलेजों में जागरूकता अभियान चलाने का निर्णय लिया है। ग्रामीण क्षेत्रों में आंगनबाड़ी और आशा कार्यकर्ताओं के माध्यम से लोगों को स्वच्छ पानी, हाथ धोने और साफ-सफाई के महत्व के बारे में जागरूक किया जा रहा है। सार्वजनिक स्थानों पर लगे वाटर कूलर और हैंडपंप के पानी की नियमित जांच के निर्देश भी दिए गए हैं। हालांकि, इन निर्देशों का जमीनी स्तर पर कितना पालन हो रहा है, यह अभी भी बड़ा सवाल है।

केवल सरकार के भरोसे बैठने से काम नहीं चलेगा। हर नागरिक को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। यदि हम स्वच्छ पानी पिएं, साफ भोजन करें, हाथ धोने की आदत अपनाएं और लक्षण दिखाई देते ही चिकित्सक से संपर्क करें, तो हेपेटाइटिस जैसी गंभीर बीमारी को काफी हद तक रोका जा सकता है। साफ पानी, स्वच्छ भोजन और सुरक्षित आदतें ही इस बीमारी से बचाव का सबसे प्रभावी उपाय हैं।

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