नई दिल्ली, 6 अगस्त।
सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसे व्यक्ति को दोषमुक्त कर दिया, जिसने गलत दोषसिद्धि और लंबी न्यायिक प्रक्रिया के कारण अपनी जिंदगी के 22 वर्ष गंवा दिए। अदालत ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों का सही मूल्यांकन नहीं किया और ओडिशा हाईकोर्ट भी मामले में प्रभावी हस्तक्षेप नहीं कर सका।
शीर्ष अदालत ने कहा कि यह मामला दिखाता है कि न्याय पाने की राह में आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति को कितनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। अदालत ने माना कि समाज के वंचित और जेल में बंद लोगों तक न्याय की पहुंच अब भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
अदालत ने बताया कि संबंधित व्यक्ति ने 12 वर्ष जेल में बिताने के बाद हाईकोर्ट में अपील की थी। हालांकि, अपील दाखिल करने में 3,157 दिन की देरी को आधार बनाकर उसे सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया। इसके बाद उसे 10 वर्ष और जेल में रहना पड़ा और कुल 22 वर्ष कारावास में बीत गए।
पीठ ने कहा कि यह जेल से दायर की गई अपील थी, इसलिए हाईकोर्ट को व्यवहारिक और सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण अपनाना चाहिए था। अदालत के अनुसार, देरी को माफ कर कम से कम अपील के गुण-दोष पर सुनवाई का अवसर दिया जाना चाहिए था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लोकतंत्र के तीनों स्तंभ गरीबों तक कानूनी सहायता पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसे में अदालतों को विशेष रूप से दोषसिद्ध कैदियों के मामलों में देरी माफ करने के प्रश्न पर अधिक उदार और सक्रिय रुख अपनाना चाहिए।
मामले के साक्ष्यों की दोबारा जांच करने पर अदालत ने पाया कि केवल एक प्रत्यक्षदर्शी के बयान के आधार पर दोषसिद्धि उचित नहीं थी। अदालत ने माना कि उस गवाह का बयान भरोसेमंद नहीं था और उसमें पर्याप्त स्थिरता का अभाव था। इसके आधार पर तीनहरे हत्याकांड के मामले में आरोपी को बरी कर दिया गया।
अदालत ने कहा कि केवल संदेह के आधार पर हिरासत में लिए गए व्यक्ति से कथित रूप से थर्ड डिग्री तरीकों का इस्तेमाल कर स्वीकारोक्ति ली गई, जो साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य नहीं थी। इसके बावजूद ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों का समुचित मूल्यांकन नहीं किया और हाईकोर्ट भी निष्क्रिय बना रहा, जिससे बिना विश्वसनीय साक्ष्य के एक व्यक्ति के जीवन के 22 वर्ष समाप्त हो गए।















