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संपादकीय
06 Aug, 2026

नई पीढ़ी से नए भारत का संवाद

देशभर के 100 शहरों में शुरू की गई नई पीढ़ी से संवाद की पहल के जरिए जेन जी की आकांक्षाओं, चुनौतियों और राष्ट्र निर्माण में उनकी भागीदारी पर चर्चा की जा रही है।

नई दिल्ली, 06 अगस्त।

भारत की राजनीति और समाज का भविष्य आज उस पीढ़ी के हाथ में है, जिसे जेन जी कहा जाता है। यह वह पीढ़ी है, जो इंटरनेट के साथ बड़ी हुई है, स्मार्टफोन की स्क्रीन पर दुनिया देखती है, सवाल पूछती है और परंपरा से ज्यादा प्रमाण मांगती है। इस पीढ़ी को समझने के लिए अब पुराने तरीके कारगर नहीं होंगे। भाषण, रैलियां और नारे अब उतना असर नहीं करते, जितना सीधा संवाद और भरोसा करता है। इसी जरूरत को समझते हुए देशभर के 100 शहरों में युवाओं से सीधे संवाद की पहल शुरू की गई है। इसका उद्देश्य जेन जी की आवाज सुनना, उनकी चिंताओं को समझना और उन्हें राष्ट्र निर्माण का भागीदार बनाना है।

जेन जी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह किसी बात को आंख मूंदकर स्वीकार नहीं करती। वह तर्क चाहती है, पारदर्शिता चाहती है और जवाबदेही चाहती है। सोशल मीडिया ने इस पीढ़ी को मुखर बना दिया है। एक ट्वीट, एक रील या एक पोस्ट किसी भी मुद्दे को राष्ट्रीय बहस का विषय बना सकती है। लेकिन इसी मुखरता के साथ इस पीढ़ी में भ्रम और असंतोष भी है। रोजगार की अनिश्चितता, महंगाई, मानसिक तनाव और पहचान के संकट ने इसके सामने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि इन सवालों का समय पर जवाब नहीं मिला तो यह असंतोष विरोध और दूरी में बदल सकता है। इसलिए संवाद ही सबसे प्रभावी रास्ता है।

देशभर के 100 शहरों में होने वाले इस संवाद कार्यक्रम की रूपरेखा भी इसी सोच पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल भाषण देना नहीं, बल्कि युवाओं को सुनना है। उन्हें ऐसा मंच देना है, जहां वे बिना डरे अपनी बात रख सकें। शिक्षा, रोजगार, कौशल, स्टार्टअप, जलवायु परिवर्तन और सांस्कृतिक पहचान जैसे विषयों पर खुली चर्चा होगी। कार्यक्रम का स्वरूप भी जेन जी के अनुरूप रखा गया है। लंबे भाषणों के बजाय पैनल चर्चा, प्रश्नोत्तर और लाइव फीडबैक को प्राथमिकता दी गई है, ताकि युवा स्वयं को इस प्रक्रिया का हिस्सा महसूस करें।

इस पहल की सबसे बड़ी जरूरत इसलिए भी है क्योंकि पिछले कुछ समय में जेन जी और व्यवस्था के बीच दूरी दिखाई दी है। सोशल मीडिया पर कई बार यह दूरी टकराव में बदल जाती है। युवाओं को लगता है कि उनकी बात सुनी नहीं जा रही, जबकि नीति निर्माताओं को लगता है कि युवा धैर्य नहीं रखते और केवल आलोचना करते हैं। इस खाई को पाटने के लिए आमने-सामने बैठकर बात करना जरूरी है। जब कोई युवा अपने शहर में किसी वरिष्ठ नेता या नीति निर्माता से सीधे सवाल पूछेगा और उसे संतोषजनक जवाब मिलेगा, तो व्यवस्था के प्रति उसका भरोसा भी मजबूत होगा।

100 शहरों का चयन भी सोच-समझकर किया गया है। इसमें केवल महानगर ही नहीं, बल्कि टियर-2 और टियर-3 शहर भी शामिल हैं। जेन जी अब केवल दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु तक सीमित नहीं है। भोपाल, इंदौर, नागपुर, जयपुर, पटना और रांची जैसे शहरों के युवा भी उतने ही जागरूक और महत्वाकांक्षी हैं। इन शहरों में कॉलेज, स्टार्टअप और कोचिंग संस्थानों की संख्या तेजी से बढ़ी है। यहां के युवा भी राष्ट्रीय विमर्श में अपनी भागीदारी चाहते हैं, इसलिए संवाद को जमीनी स्तर तक ले जाना जरूरी था।

संवाद के मुख्य विषय भी जेन जी की प्राथमिकताओं को ध्यान में रखकर तय किए गए हैं। पहला विषय रोजगार और कौशल है। आज का युवा केवल सरकारी नौकरी के पीछे नहीं भाग रहा, बल्कि स्टार्टअप, फ्रीलांसिंग और गिग इकोनॉमी में भी अवसर तलाश रहा है। दूसरा विषय शिक्षा है। परीक्षा, पेपर लीक, कोचिंग का दबाव और डिग्री की प्रासंगिकता जैसे मुद्दे हर युवा को प्रभावित कर रहे हैं। तीसरा विषय मानसिक स्वास्थ्य है। सोशल मीडिया की तुलना और करियर का दबाव इस पीढ़ी को भीतर से प्रभावित कर रहा है। चौथा विषय राष्ट्र और संस्कृति है। जेन जी अपनी जड़ों से जुड़ना चाहती है, लेकिन उसे पुरानी बातें थोपने के बजाय तर्क और संवाद के साथ समझाना होगा।

इस संवाद की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि यह केवल एक आयोजन बनकर न रह जाए, बल्कि निरंतर चलने वाली प्रक्रिया बने। एक बार संवाद कर फोटो खिंचवाकर चले जाने से कुछ नहीं होगा। हर शहर से मिलने वाले सुझावों को एक केंद्रीय पोर्टल पर दर्ज किया जाना चाहिए और समय-समय पर यह बताया जाना चाहिए कि उनमें से कितनों पर काम हुआ। यदि युवाओं को अपनी बात का असर नीति में दिखाई देगा, तभी उनका भरोसा मजबूत होगा। यदि ऐसा नहीं हुआ तो यह पहल भी एक और औपचारिकता बनकर रह जाएगी।

एक और जरूरी बात यह है कि संवाद में केवल उन्हीं युवाओं को न बुलाया जाए, जो पहले से किसी संगठन से जुड़े हैं। असली जेन जी वह भी है, जो कॉलेज के बाद नौकरी की तलाश में है, जो यूट्यूब से कोडिंग सीख रहा है और जो छोटे शहर में रहकर बड़े सपने देख रहा है। ऐसे युवाओं तक भी पहुंचना होगा। इसके लिए कॉलेजों, स्वयंसेवी संस्थाओं और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स की मदद ली जा सकती है, ताकि संवाद में विविधता आए और हर वर्ग की आवाज सुनी जाए।

जेन जी को साधने का मतलब उसे नियंत्रित करना नहीं, बल्कि उसे साथ लेकर चलना है। यह पीढ़ी सवाल पूछती है क्योंकि उसे देश की चिंता है और वह बेहतर भारत चाहती है। यदि इस ऊर्जा को सही दिशा दी जाए तो यही पीढ़ी विकसित भारत की सबसे मजबूत आधारशिला बनेगी। लेकिन यदि इसे नजरअंदाज किया गया तो यही ऊर्जा निराशा और पलायन में बदल सकती है।

देशभर के 100 शहरों में होने वाला यह संवाद एक शुरुआत है, एक प्रयोग है। यदि यह सफल हुआ तो भारतीय राजनीति और समाज के लिए एक नया मॉडल बन सकता है, जहां नेता केवल बोलेंगे नहीं, बल्कि सुनेंगे भी और युवा केवल शिकायत नहीं करेंगे, बल्कि समाधान भी देंगे। नई पीढ़ी के साथ सार्थक संवाद ही समय की मांग है, क्योंकि जो पीढ़ी सवाल पूछती है, वही भविष्य के जवाब भी गढ़ती है।

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