नई दिल्ली, 06 अगस्त।
भारत में नशे की समस्या अब केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं रही, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक ताने-बाने और युवा पीढ़ी के भविष्य के लिए गंभीर चुनौती बन चुकी है। केंद्रीय गृह मंत्रालय के अनुसार, देशभर में एनडीपीएस अधिनियम के तहत 3.96 लाख मामले दर्ज हैं। यह बढ़ती संख्या बताती है कि नशे का नेटवर्क अब महानगरों से निकलकर छोटे शहरों, कस्बों और शैक्षणिक संस्थानों तक पहुंच चुका है। सिंथेटिक ड्रग्स ने इस खतरे को और बढ़ा दिया है। इन्हें लैब में तैयार कर चॉकलेट, वेप और कैंडी जैसे रूपों में युवाओं तक पहुंचाया जा रहा है, जिससे इनकी पहचान करना कठिन हो गया है।
चिंता की बात यह भी है कि डार्क वेब, सोशल मीडिया, टेलीग्राम और क्रिप्टोकरेंसी के जरिए नशे का कारोबार तेजी से फैल रहा है। पारंपरिक पुलिसिंग के लिए इस नेटवर्क तक पहुंचना आसान नहीं है। वहीं, मामलों की अधिकता से जांच और न्यायिक प्रक्रिया भी प्रभावित हो रही है। फोरेंसिक जांच में देरी और विशेष विशेषज्ञता की कमी कई बार कार्रवाई को कमजोर कर देती है।
सबसे ज्यादा प्रभावित 15 से 30 वर्ष आयु वर्ग के युवा हैं। बेरोजगारी, मानसिक तनाव, पारिवारिक समस्याएं और सोशल मीडिया पर नशे का बढ़ता महिमामंडन उन्हें इस दलदल की ओर धकेल रहा है। इसलिए केवल छापेमारी या गिरफ्तारी से समस्या का समाधान संभव नहीं है। स्कूलों और कॉलेजों में जागरूकता अभियान, काउंसलिंग, पुनर्वास केंद्र और रोजगार के अवसर बढ़ाने होंगे।
नशे के खिलाफ लड़ाई को अब केवल कानून लागू करने तक सीमित नहीं रखा जा सकता। केंद्र और राज्यों की एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय, साइबर निगरानी, तस्करी के अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क पर सख्त कार्रवाई और समाज की सक्रिय भागीदारी जरूरी है। 3.96 लाख मामले केवल आंकड़ा नहीं, बल्कि चेतावनी हैं कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो सिंथेटिक ड्रग्स का यह जाल देश की युवा शक्ति को खोखला कर देगा।














