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संपादकीय
06 Aug, 2026

ट्रैफिक का शोर-शराबा सेहत पर भारी नींद बाधित, तनाव बढ़ा, पार्किंसन का खतरा

सड़क यातायात का बढ़ता शोर केवल ध्वनि प्रदूषण ही नहीं बल्कि तनाव, अनिद्रा और पार्किंसन जैसी गंभीर तंत्रिका संबंधी बीमारियों का बड़ा खतरा बन रहा है।

नई दिल्ली, 06 अगस्त।

दिल्ली की सड़कों पर हर दिन हजारों वाहनों का शोर केवल ध्वनि प्रदूषण नहीं, बल्कि एक धीमा जहर बनकर लोगों के शरीर और मन दोनों को प्रभावित कर रहा है। सुबह से रात तक बजते हॉर्न, तेज आवाज में चलते इंजन और लगातार गूंजता ट्रैफिक अब आम जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इसके असर को हम हल्के में ले रहे हैं। ताजा शोध बताते हैं कि ट्रैफिक का शोर सिर्फ नींद खराब नहीं करता, बल्कि दिमाग और तंत्रिका तंत्र से जुड़ी गंभीर बीमारियों का खतरा भी बढ़ाता है। लंबे समय तक शोर के संपर्क में रहने से तनाव बढ़ाने वाले हार्मोन का स्तर बढ़ जाता है और नींद बाधित होती है, जिससे मस्तिष्क की कोशिकाओं को नुकसान पहुंच सकता है।

वैज्ञानिकों के अनुसार, जब कोई व्यक्ति लगातार ऊंचे डेसीबल वाले शोर में रहता है तो उसका शरीर लगातार अलर्ट मोड में बना रहता है। इस स्थिति में कोर्टिसोल नामक तनाव हार्मोन का स्तर बढ़ जाता है। इसका असर रक्तचाप, हृदय गति और प्रतिरोधक क्षमता पर पड़ता है। साथ ही नींद का चक्र भी बिगड़ जाता है। पर्याप्त और गहरी नींद न मिलने से थकान, चिड़चिड़ापन और एकाग्रता में कमी आती है। यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहे तो इसका सीधा प्रभाव मस्तिष्क पर पड़ता है।

ट्रैफिक के शोर और पार्किंसन जैसी तंत्रिका संबंधी बीमारी के बीच भी संबंध सामने आया है। पार्किंसन में मस्तिष्क की कोशिकाएं धीरे-धीरे नष्ट होने लगती हैं और शरीर की गतिविधियों पर नियंत्रण कम हो जाता है। पहले इसे केवल बढ़ती उम्र या अनुवांशिक कारणों से जुड़ा माना जाता था, लेकिन अब शोध बताते हैं कि पर्यावरणीय कारण भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लगातार शोर के संपर्क में रहने वाले लोगों में पार्किंसन के लक्षण जल्दी दिखाई देने की आशंका अधिक होती है। इसका कारण यह है कि शोर से होने वाला तनाव और नींद की कमी मस्तिष्क में डोपामिन बनाने वाली कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाती है। डोपामिन की कमी को ही पार्किंसन का प्रमुख कारण माना जाता है।

इस विषय पर हुए एक बड़े अध्ययन में 40 वर्ष या उससे अधिक उम्र के 31 लाख लोगों का लगभग 18 वर्षों तक अध्ययन किया गया। इसे सड़क यातायात के शोर और पार्किंसन रोग के बीच संबंध पर अब तक की सबसे बड़ी स्टडी माना जा रहा है। अध्ययन में पाया गया कि लंबे समय तक अधिक शोर वाले क्षेत्रों में रहने वालों में पार्किंसन का खतरा बढ़ जाता है। वहीं 11.5 डेसीबल शोर बढ़ने पर इसका जोखिम लगभग 3 प्रतिशत बढ़ जाता है। यह आंकड़ा छोटा दिख सकता है, लेकिन बड़ी आबादी के संदर्भ में यह गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती है।

दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और भोपाल जैसे शहरों में स्थिति और भी चिंताजनक है। यहां रात 10 बजे के बाद भी ट्रैफिक का शोर 70 से 80 डेसीबल तक पहुंच जाता है, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार रात में 40 डेसीबल से अधिक शोर स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। अस्पतालों, स्कूलों और रिहायशी क्षेत्रों के आसपास भी यह मानक लगातार टूट रहा है। लोग भले इस शोर के साथ जीने के अभ्यस्त हो गए हों, लेकिन शरीर लगातार इसका दुष्प्रभाव झेल रहा है। चिकित्सकों के अनुसार, लगातार शोर के कारण हृदय रोग, मधुमेह, मोटापा और मानसिक अवसाद का खतरा भी बढ़ता है। बच्चों में सीखने की क्षमता प्रभावित होती है, जबकि बुजुर्गों के लिए यह और अधिक नुकसानदेह साबित होता है।

समाधान केवल व्यक्तिगत स्तर पर संभव नहीं है। ट्रैफिक नियमों का सख्ती से पालन, अनावश्यक हॉर्न पर जुर्माना, अधिक शोर करने वाले वाहनों की जांच, ग्रीन बेल्ट और ध्वनि अवरोधक दीवारों का निर्माण जरूरी है। लोगों को भी रात के समय अनावश्यक शोर, तेज संगीत और पटाखों से बचना चाहिए। ट्रैफिक का शोर अब केवल असुविधा नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य का गंभीर संकट बन चुका है। यदि समय रहते इस पर प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में तनाव, अनिद्रा, हृदय रोग और पार्किंसन जैसी बीमारियों का बोझ बढ़ता जाएगा। सरकार को ध्वनि प्रदूषण को वायु और जल प्रदूषण जितनी गंभीरता से लेना होगा, वहीं नागरिकों को भी यह समझना होगा कि सड़क पर बजाया गया एक अनावश्यक हॉर्न किसी की नींद, मानसिक शांति और सेहत पर भारी पड़ सकता है। शांत शहर ही स्वस्थ समाज की पहचान है।

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