नई दिल्ली, 15 सितंबर।
दिल्ली विधानसभा के अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता ने कहा कि अलग-अलग विधानसभाओं की क्षमताएं भले ही समान न हों, लेकिन उनकी लोकतांत्रिक गरिमा में कोई अंतर नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि संसाधनों की कमी सुधारों की गति को प्रभावित कर सकती है, लेकिन इससे जनप्रतिनिधियों और नागरिकों की समान एवं गरिमापूर्ण भागीदारी का अधिकार सीमित नहीं होना चाहिए।
गुप्ता ने दक्षिण अफ्रीका के केप टाउन में आयोजित 69वें राष्ट्रमंडल संसदीय सम्मेलन में ‘संसाधन-सीमित संसदों में समावेशी उपायों को प्रभावी रूप से लागू करना’ विषय पर संयुक्त नेटवर्क कार्यशाला की अध्यक्षता की। उन्होंने प्रतिनिधित्व के साथ वास्तविक भागीदारी सुनिश्चित करने पर जोर दिया।
उन्होंने जनवरी 2026 तक राष्ट्रीय संसदों में महिलाओं की हिस्सेदारी 27.5 प्रतिशत होने का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि करीब पांच में से केवल एक संसदीय अध्यक्ष महिला है। दिव्यांगजनों की भागीदारी का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुमान के अनुसार 1.3 अरब लोग महत्वपूर्ण स्तर की दिव्यांगता का अनुभव करते हैं।
गुप्ता ने कहा कि महिलाओं को नेतृत्व और समितियों में प्रभावी भूमिका से दूर रखना, दिव्यांग सदस्यों के लिए सदन की कार्यवाही और दस्तावेजों तक पहुंच मुश्किल होना तथा ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों से आए नए सदस्यों को पर्याप्त सहयोग नहीं मिलना समावेशी लोकतंत्र के लिए चुनौती है।
उन्होंने कहा कि केवल प्रतिनिधित्व हासिल करना पर्याप्त नहीं है। सभी सदस्यों को संसदीय कार्यों में सार्थक रूप से शामिल करने की व्यवस्था होनी चाहिए। उनके अनुसार समावेशी भागीदारी संसदीय क्षमता पर अतिरिक्त भार नहीं है, बल्कि उपलब्ध संसाधनों और क्षमता के बेहतर इस्तेमाल का माध्यम है।
विजेंद्र गुप्ता ने कहा कि विधानसभाओं को चुनाव से लेकर सदस्यों के शुरुआती प्रशिक्षण, समितियों की जिम्मेदारी, बोलने के अवसर और नेतृत्व तक सत्ता के इस्तेमाल की पूरी प्रक्रिया की समीक्षा करनी चाहिए। उन्होंने लैंगिक संवेदनशील संसदों से जुड़े मानकों और जांच-सूची को समान भागीदारी तथा बुनियादी ढांचे के मूल्यांकन का उपयोगी आधार बताया।
उन्होंने कहा कि आकलन केवल रिपोर्ट तैयार करने तक सीमित नहीं होना चाहिए। इसके जरिए बाधाओं की पहचान, संस्थागत जिम्मेदारी और सुधारों की समय-सीमा तय होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि सार्थक सुधार के लिए हमेशा बड़े खर्च की जरूरत नहीं होती। नियमों में सुधार, सुविधाजनक दस्तावेज, बेहतर बैठक व्यवस्था, उत्पीड़न विरोधी तंत्र और नए सदस्यों के लिए शुरुआती सहयोग जैसे कदम भी प्रभावी हो सकते हैं।
दिव्यांगजनों की भागीदारी के लिए उन्होंने सुगम व्यवस्था को केवल रैंप और लिफ्ट तक सीमित नहीं रखने की बात कही। उन्होंने सांकेतिक भाषा, ब्रेल, सरल पठन सामग्री, ऑडियो सामग्री, सुगम डिजिटल जानकारी, ऑनलाइन दस्तावेज, लाइव प्रसारण, स्क्रीन रीडर अनुकूल वेबसाइट और सुगम मतदान व्यवस्था जैसे उपायों पर जोर दिया।
गुप्ता ने राष्ट्रमंडल देशों के बीच संस्थागत क्षमता साझा करने की जरूरत भी बताई। उन्होंने समावेशी भागीदारी के नियमित आकलन, कम लागत वाले समयबद्ध सुधार, मापनीय साझा संकेतक और सफल संसदीय व्यवस्थाओं का साझा भंडार तैयार करने का प्रस्ताव रखा।
















