नई दिल्ली, 17 सितंबर।
दिल्ली उच्च न्यायालय ने केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सेंसर बोर्ड) को एक अहम निर्देश देते हुए कहा है कि वह फिल्म 'मिर्ज़ापुर: द मूवी' के निर्माताओं के उस अनुरोध पर एक सप्ताह के भीतर विचार करे, जिसमें फिल्म के एक खास दृश्य में 'शूरवीर' गाने की जगह केवल बैकग्राउंड म्यूजिक का इस्तेमाल करने की अनुमति मांगी गई है। मुख्य न्यायाधीश डीके उपाध्याय की अगुवाई वाली खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि इस याचिका पर अगली सुनवाई अब आगामी 24 सितंबर को तय की गई है।
बीते गुरुवार को हुई सुनवाई के दौरान फिल्म निर्माताओं के वकील ने अदालत को बताया कि मूवी के क्लाइमेक्स सीक्वेंस में दो गुटों के बीच संघर्ष को दर्शाने के दौरान 'शूरवीर' गीत का प्रयोग किया गया है, और इस गाने की तुलना किसी भी तरह से महान ऐतिहासिक शख्सियत महाराणा प्रताप से नहीं की जानी चाहिए। इस पर टिप्पणी करते हुए अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया यह गाना इस संदर्भ में सही प्रतीत नहीं होता है, और आज समाज में हिंसा को जिस तरह से महिमामंडित किया जा रहा है, वह चिंता का विषय है। हालांकि कोर्ट ने यह भी साफ किया कि वह इस मामले के गुण-दोष पर कोई सख्त टिप्पणी किए बिना चाहती है कि इस कलात्मक विषय पर सक्षम प्राधिकार यानी सेंसर बोर्ड ही उचित फैसला ले।
सुनवाई के दौरान अदालत ने इस तथ्य पर विशेष रूप से गौर किया कि फिल्म निर्माताओं ने खुद सिनेमैटोग्राफ रूल्स के नियम 31 के तहत सेंसर बोर्ड के समक्ष आवेदन देकर 'शूरवीर' गीत के स्थान पर बैकग्राउंड म्यूजिक को जोड़ने की अनुमति मांगी है। सेंसर बोर्ड की ओर से पेश वकील ने कोर्ट को भरोसा दिलाया कि निर्माताओं के इस आवेदन पर एक सप्ताह के भीतर विधिवत निर्णय ले लिया जाएगा, जिसके बाद अदालत ने मामले की अगली तारीख तय कर दी।
गौरतलब है कि यह कानूनी विवाद तब सामने आया जब राजस्थान के उदयपुर स्थित महाराणा प्रताप यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएट प्रशांत कुमार सिंह ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर फिल्म में 'शूरवीर' गीत के इस्तेमाल पर कड़ी आपत्ति जताई। याचिकाकर्ता का तर्क है कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण विभूतियों से जुड़े गीतों का उपयोग इस तरह से नहीं किया जाना चाहिए जिससे उनकी महान विरासत का संबंध काल्पनिक अपराधियों या समाज-विरोधी तत्वों से जुड़े। याचिका में कला और रचनात्मक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के साथ-साथ ऐतिहासिक सम्मान के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए उचित दिशा-निर्देश तय करने की भी मांग की गई है।















