मुंबई, 17 सितंबर।
बॉम्बे उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि केवल 240 दिन लगातार काम करने के आधार पर सरकार या उसके उपक्रम में संविदा कर्मचारी को नियमित नहीं किया जा सकता। ऐसा आदेश सरकारी व्यवस्था में नए पद के निर्माण के समान माना जाएगा।
न्यायमूर्ति संदीप वी. मारने की एकल पीठ ने ओएनजीसी बनाम सेंट्रल इंडस्ट्रीज ट्रिब्यूनल एवं अन्य मामले में यह बात कही। पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 तथा सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व निर्णय के संदर्भ में नियमितीकरण की सीमा स्पष्ट की।
एक मामले में औद्योगिक न्यायाधिकरण ने जीएमसी के संविदा कर्मचारियों को स्थायी करने का आदेश दिया था। उच्च न्यायालय ने इस आदेश को निरस्त कर दिया।
पीठ ने कहा कि सरकार स्वयं संविदा पदों को नियमित करने की योजना पर विचार कर रही थी। ऐसे में संबंधित कर्मचारियों के मामलों पर उसी योजना के तहत विचार किया जाना चाहिए, केवल 240 दिन काम करने के आधार पर उन्हें स्वतः स्थायी नहीं किया जा सकता।
ओएनजीसी से जुड़े मामले में स्थिति अलग पाई गई। इसमें मुख्य सवाल यह था कि संबंधित कर्मचारी वास्तव में ठेकेदार के कर्मचारी थे या ठेका व्यवस्था केवल कागजों पर थी और वे वास्तविक रूप से ओएनजीसी के लिए काम कर रहे थे।
ओएनजीसी के प्रमाणित स्थायी आदेश में प्रावधान है कि कोई अस्थायी कर्मचारी 12 महीने में 240 दिन काम करता है और निर्धारित न्यूनतम योग्यता रखता है, तो उसके नियमित कर्मचारी के रूप में विचार किया जा सकता है।
पीठ ने पाया कि संबंधित कर्मचारी कई वर्षों से ओएनजीसी की निगरानी में उसके स्थायी प्रकृति के कार्य कर रहे थे। इस आधार पर ठेका व्यवस्था को दिखावटी माना गया और कर्मचारियों को ओएनजीसी का कर्मचारी माना गया।
उच्च न्यायालय ने संबंधित कर्मचारियों को उनकी पदों पर नियमित करने का आदेश दिया। साथ ही 240 दिन पूरे होने की तारीख से वेतनमान में संशोधन, पिछला वेतन और सेवा समाप्ति से जुड़े लाभ देने के निर्देश दिए गए।
न्यायालय के फैसले का सार यह है कि महज 240 दिन काम करना सरकारी नौकरी में नियमितीकरण का आधार नहीं बन सकता। ऐसा करना नए सरकारी पद के निर्माण के रूप में देखा जा सकता है।
दूसरी स्थिति तब बनती है, जब प्रमाणों से यह सामने आए कि संविदा व्यवस्था केवल नाममात्र की थी, कर्मचारी वास्तव में सरकारी उपक्रम के लिए काम कर रहे थे और संबंधित स्थायी आदेश में नियमितीकरण की व्यवस्था मौजूद थी।
ऐसी परिस्थिति में न्यायाधिकरण या न्यायालय इसे नया पद बनाना नहीं मानता, बल्कि पहले से मौजूद वास्तविक कर्मचारी-नियोक्ता संबंध को मान्यता देने के आधार पर नियमितीकरण का आदेश दे सकता है।















