कोलकाता, 21 सितंबर।
भारत और बांग्लादेश के बीच साल 1996 में हुई ऐतिहासिक फरक्का जल संधि की 30 वर्षीय अवधि इसी वर्ष दिसंबर में पूरी होने जा रही है। इस समझौते के नवीनीकरण से पहले ही केंद्र सरकार के समक्ष देश के दो प्रमुख राज्यों—बिहार और पश्चिम बंगाल—ने अपने-अपने क्षेत्रीय हितों, चिंताओं और भविष्य की विकासात्मक जरूरतों को पुरजोर तरीके से रखना शुरू कर दिया है।
बिहार में सत्तारूढ़ जेडीयू का पक्ष है कि मौजूदा समझौते को बिना किसी बदलाव के आगे बढ़ाने के बजाय आने वाले दशकों की प्राथमिकताओं को ध्यान में रखते हुए एक नई और वैज्ञानिक समीक्षा आधारित व्यवस्था बनाई जानी चाहिए। पार्टी का तर्क है कि गंगा नदी चूंकि फरक्का पहुंचने से पहले बिहार के भू-भाग से होकर गुजरती है, इसलिए जल बंटवारे के फैसलों में राज्य की प्रभावी हिस्सेदारी होनी चाहिए। बिहार ने वर्ष 2050 तक अपनी बढ़ती पेयजल, सिंचाई और औद्योगिक आवश्यकताओं को रेखांकित करते हुए गाद (सिल्ट) जमने, नदी तल के ऊपर उठने, भीषण कटाव और बाढ़ जैसी गंभीर समस्याओं के स्थायी समाधान की मांग की है।
दूसरी ओर, पश्चिम बंगाल सरकार ने भी केंद्र के समक्ष कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी नए समझौते या व्यवस्था में राज्य के आर्थिक और पर्यावरणीय हितों की अनदेखी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। राज्य का मुख्य जोर इस बात पर है कि सूखे महीनों के दौरान हुगली नदी में पर्याप्त मात्रा में जल प्रवाह सुनिश्चित किया जाए। अधिकारियों का कहना है कि फरक्का से हुगली में पानी का उचित बहाव न होने से वहां भारी गाद जमने लगती है, जिससे कोलकाता स्थित श्यामा प्रसाद मुखर्जी बंदरगाह की नौवहन क्षमता के साथ-साथ राज्य की संपूर्ण आर्थिक गतिविधियों पर संकट आ सकता है। इसके अलावा, बंगाल ने मालदा, मुर्शिदाबाद और नदिया जिलों में नदी के कटाव तथा बाढ़ की विभीषिका से निपटने के लिए एक व्यापक रणनीति की मांग की है।
इस पूरे मामले पर फरक्का बैराज के सुपरिटेंडेंट इंजीनियर-कम-कोऑर्डिनेटर रामजीत बर्मा ने स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया कि बिहार और पश्चिम बंगाल दोनों की तरफ से अपने प्रस्ताव और चिंताएं केंद्रीय मंत्रालय को मिल चुकी हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि बैराज की भूमिका केवल संधि के प्रावधानों को धरातल पर लागू करवाने तक सीमित है, जबकि पानी के माप और संयुक्त अवलोकन का कार्य केंद्रीय जल आयोग स्वतंत्र रूप से करता है। चूंकि यह एक संवेदनशील राष्ट्रीय परियोजना है, इसलिए विदेश मंत्रालय और जल शक्ति मंत्रालय के मार्गदर्शन में तमाम पक्षों के हितों को तोलते हुए अंतिम निर्णय राष्ट्रीय स्तर पर ही लिया जाएगा।
गौरतलब है कि साल 1975 में चालू किया गया फरक्का बैराज और 1996 की गंगा जल संधि दो अलग-अलग विषय हैं। बांग्लादेश लंबे समय से यह चिंता जताता रहा है कि शुष्क मौसम में फरक्का द्वारा पानी मोड़े जाने से उसके दक्षिण-पश्चिमी हिस्से में कृषि, मत्स्य पालन और आजीविका प्रभावित होती है, जिसके समाधान के लिए यह संधि की गई थी। अब जबकि संधि के नवीनीकरण का समय नजदीक आ रहा है, तो भारत और बांग्लादेश की तकनीकी टीमें लगातार जल प्रवाह के आंकड़े जुटा रही हैं। ऐसे में केंद्र सरकार के सामने यह बड़ी चुनौती होगी कि वह जलवायु परिवर्तन, राज्यों की बढ़ती जल मांग और द्विपक्षीय कूटनीति के बीच एक संतुलित व स्थायी जल प्रबंधन रूपरेखा तैयार करे।
















