कोलकाता, 22 सितंबर।
पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले के चर्चित पत्थर व्यवसायी टुलु मंडल को कलकत्ता उच्च न्यायालय से बड़ा झटका लगा है। गिरफ्तारी वारंट को चुनौती देने वाली उनकी याचिका को मंगलवार को न्यायमूर्ति सौगत भट्टाचार्य की अदालत ने खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि टुलु मंडल को निचली अदालत के आदेश का पालन करते हुए निर्धारित प्रक्रिया के तहत अदालत में पेश होना होगा।
इस पूरे प्रकरण की शुरुआत गत 28 जुलाई की देर रात हुई पुलिस कार्रवाई से हुई थी, जब बीरभूम के मोहम्मदबाजार थाना क्षेत्र के अंतर्गत देउचा गांव में स्थित टुलु के रिश्तेदार मिनार मंडल के आवास पर पुलिस ने औचक छापेमारी की थी। इस दौरान जांच टीमों ने लगभग 28.5 करोड़ रुपये की भारी-भरकम नकदी और 15 किलोग्राम सोना बरामद करने का दावा किया था। इस सनसनीखेज खुलासे के बाद से ही केंद्रीय व स्थानीय जांच एजेंसियों की रडार पर टुलु मंडल बने हुए हैं।
पुलिस और जांच दल उनकी तलाश में कई संभावित ठिकानों पर दबिश दे चुके हैं, लेकिन वह अब तक हाथ नहीं आए हैं। एजेंसियों का पुख्ता दावा है कि टुलु मंडल छापेमारी से पहले ही देश छोड़कर विदेश फरार हो चुके हैं। इस बीच, स्थानीय पुलिस ने उनके खिलाफ आधिकारिक रूप से प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज की और अदालत से गिरफ्तारी वारंट जारी कराया। सिउड़ी स्थित अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (ACJM) की अदालत ने उन्हें अदालत के समक्ष उपस्थित होने का सख्त निर्देश दिया था, लेकिन तय समय सीमा बीत जाने के बाद भी वह पेश नहीं हुए।
मंगलवार को उच्च न्यायालय में सुनवाई के दौरान टुलु मंडल की तरफ से पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे ने दलील दी कि 30 जुलाई को मोहम्मदबाजार थाने में मामला दर्ज किया गया और उसी दिन बिना पर्याप्त समय दिए गैर-जमानती धाराओं में गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया गया। उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि क्या किसी आरोपी को बिना उचित अवसर दिए इस तरह वारंट जारी किया जा सकता है। बचाव पक्ष ने यह भी बताया कि 10 अगस्त को निचली अदालत ने एक अन्य आदेश में उन्हें 14 सितंबर तक हाजिर होने को कहा था।
दूसरी ओर, राज्य सरकार की तरफ से उच्च न्यायालय में एक बंद लिफाफे में जांच रिपोर्ट प्रस्तुत की गई। राज्य पक्ष का तर्क था कि प्रारंभिक जांच के दौरान टुलु मंडल की संलिप्तता के पुख्ता सबूत मिले हैं और तकनीकी सर्विलांस से यह भी स्पष्ट हुआ कि वह गत 23 मई को ही देश छोड़कर विदेश जा चुके हैं। पुलिस की निरंतर खोजबीन से यह साफ हो चुका है कि वह फिलहाल देश में मौजूद नहीं हैं।
मामलात के सभी पक्षों को सुनने के बाद उच्च न्यायालय ने टिप्पणी की कि जांच एजेंसी के पास इस बात के ठोस प्रमाण मौजूद हैं कि आरोपी विदेश जा चुका है, इसलिए उन्हें निचली अदालत के आदेश का पालन करना चाहिए। अदालत ने यह भी जोड़ा कि यदि इसके बाद उनके खिलाफ कोई कठोर विधिक कार्रवाई होती है, तो उनके पास अग्रिम जमानत या अन्य कानूनी उपायों का सहारा लेने का विकल्प खुला रहेगा। इन तर्कों के साथ न्यायमूर्ति सौगत भट्टाचार्य ने उनकी याचिका को खारिज कर दिया।















